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दिग्विजय का मध्य प्रदेश की राजनीति में बढ़ता दखल

दिग्विजय सिंह ऐसे निराले नेताओं में हैं कि वे हारे और हारने का ठींकरा किसी अन्य राजनेता अथवा सहयोगियों पर फोडऩे की बजाय सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। वे चाहते तो वचन भंग करते हुए संप्रग सरकार में सरलता से मंत्री बन सकते थे। लेकिन इस खींची राजवंश के क्षेत्रीय नेता ने 'प्राण जाएं पर वचन न जाए' कहावत का पालन किया। इधर, जैसे-जैसे उनके वनवास का समय निकट आ रहा है, वैसे-वैसे प्रदेश में उनकी सक्रियता बढ़ रही है। और केंद्रीय उोग व वाणिज्य राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए चुनौती बनकर उभर रहे हैं। हाल ही में दिग्विजय सिंह ने ग्वालियर अंचल का दो दिनी दौरा करके क्षेत्रीय राजनीति में हलचल ला दी। इस पूरे इलाके में दो ही जमीनी नेताओं की तूती बोलती है। एक दिग्विजय सिंह और दूसरे ज्योतिरादित्य सिंधिया। सिंधिया जिस गुना-शिवपुरी लोकसभा सीट से सांसद हैं, उसी गुना का राधौगढ़ दिग्विजय सिंह का गृहनगर है। दिग्विजय जहां कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं और आम जनता से मेल-मुलाकात के लिए सहज उपलब्ध हैं, वहीं सिंधिया के साथ ऐसा नहीं है। उनका सामंती आचरण और फौरी गुस्सा उन्हें अपने ही निष्ठावान कार्यकर्त्ताओं से अलग कर रहा है। यही वजह रही कि जब दिग्विजय गुना-शिवपुरी-ग्वालियर सड़क मार्ग से आए व गए तो नाराज सिंधियानिष्ठों ने खुलेआम दिग्विजय का आतिशी स्वागत कर पलक पांवड़े बिछा दिए। दिग्गी राजा जिंदाबाद के गगनभेदी नारों से आकाश गुंजा दिया। दरअसल सिंधिया समर्थकों ने सिंधिया को इशारा किया है कि वे न तो उपेक्षा बरदाश्त करेंगे और न ही सार्वजनिक फटकार। कार्यकर्त्ताओं को फटकार लगाने का सिलसिला सिंधिया ने मतदान केंद्र समीक्षा बैठकों के बहाने 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद से शुरू किया हुआ है। इन बैठकों में सिंधिया इस बात का मूल्यांकन करते हैं कि उन्हें किस मतदान केंद्र पर किन कारणों से वोट कम मिले। ऐसे में यदि कार्यकर्ता एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं और हार की जिम्मेबारी अपने सिर नहीं लेते तो सिंधिया एक स्कूल टीचर की तरह कार्यकर्ता को डांट पिला देते हैं। इस वक्त वे कार्यकर्ता की उम्र और ओहदे का भी लिहाज नहीं करते। यहां विडंबना यह भी देखने में आती है कि सिंधिया को लोकसभा चुनाव में मिले कम वोटों की चिंता तो सालती है लेकिन वह यह मूल्यांकन नहीं करते कि इस पूरे अंचल में कांग्रेस उम्मीदवार विधानसभा का चुनाव क्यों हारे? सिंधिया की यह फटकार शिवपुरी शहर कांग्रेस अध्यक्ष और होटल व रीयल इस्टेट के कारोबारी राकेश गुप्ता को बरदाश्त नहीं हुई। उनसे ज्यादा इस बेइज्जती ने राकेश के परिजनों ने आहत किया और उन्होंने राकेश को सिंधिया से किनारा कर लेने के लिए विवश कर दिया। राख में दबी इस चिंगारी को आग में बदलनें का काम किया पूर्व युवक कांग्रेस अध्यक्ष विजय शर्मा ने। विजय शत-प्रतिशत सिंधियानिष्ठ थे, लेकिन मीनाक्षी नटराजन की अनुकंपा से जब उन्हें मुंबई और गुजरात में होने वाले युवा कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव का लोकसभा निर्वाचन अधिकारी बनाकर भेजा गया तो सिंधिया के निंदक-नियरों ने सिंधिया के कान भर दिए और सिंधिया विजय से रुष्ट हो गए। नतीजतन विजय से सिंधिया ने सांसद प्रतिनिधि का ओहदा छीन लिया। बहरहाल इस गुट ने जब क्षत्रप बदलने की मुहिम चलाई तो राकेश और विजय की अगुवाई में जिला कांग्रेस के पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण धाकड़, महिला कांग्रेस की पूर्व जिलाध्यक्ष पूनम कुलश्रेष्ठ उनके पति रवि कुलश्रेष्ठ, माधवराव सिंधिया के जमाने से सिंधिया परिवार के विश्वासपात्र रहे रामजीलाल कुशवाह, जिला कांग्रेस के संगठन मंत्री इमरतलाल जाटव, गौरव नायक, विनोद योगी इब्राहिम खान, श्रवणलाल धाकड़ और शंभू शर्मा दिग्विजय की जमात में शामिल हो गए।
 
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