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साहब बीवी और गैंगस्टर ने बनाई पहचान: श्रेया

हिन्दी सिनेमा की दुनिया में वह बिलकुल नई नहीं हैं। गायक सुखविन्दर सिंह की बतौर नायक पहली फिल्म 'कुछ करिए' में वह मुख्य नायिका के रुप में स्क्रीन पर आईं। लेकिन, उन्हें पहचान मिली है तिग्मांशु धूलिया की फिल्म 'साहब बीवी और गैंगस्टर' में निभाए 'महुआ' के किरदार से। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की परपोती होने के बावजूद श्रेया नारायण ने अपनी पहचान से इस खास 'तमगे' को हमेशा दूर रखने की कोशिश की है। 'साहब बीवीज्' की सफलता से उत्साहित श्रेया अब अलग-अलग किरदार निभाने को बेचैन हैं। श्रेया नारायण से खास बात की:
श्रेया, शुरुआत 'साहब बीवी और गैंगस्टर' से जुड़े सवाल से ही। क्या महुआ के किरदार ने इंडस्ट्री और इंडस्ट्री के बाहर पहचान का संकट दूर कर दिया है?
जवाब-इस फिल्म ने बहुत सारे सवालों के जवाब दे दिए हैं। जब आप इंडस्ट्री में आते हैं तो पहला सवाल यही होता है कि आप कौन हैं? आप हैं भी या नहीं-ये भी पता नहीं। महुआ के किरदार की फिल्म में खास जगह है। तिग्मांशु की फिल्म का प्रजेन्स है। लोग फिल्म देख रहे हैं और आप फिल्म में दिख रहे हैं। आप कैसे लगते हैं, आप है या नहीं जैसे सवालों को डील किया है इस किरदार ने। मुझे आइडेंडिंटी दी है। मैं नोटिस हुई हूं अपने काम के लिए। लड़कियां अकसर इस तरह नोटिस होती हैं कि आप सुंदर लग रही हैं। सुंदर लगना हीरोइन का काम हो जाता है। लेकिन, साहब बीवी और गैंगस्टर में मेरा काम नोटिस हुआ है और यही मेरी सफलता है।
महुआ के किरदार के लिए तैयारी कैसे की। इतना बोल्ड करेक्टर ! कुछ डर लगा था?
जवाब- नहीं। दरअसल, तिग्मांशु धूलिया पहले निर्देशक थे, जिन्होंने मेरा मुंबई में चार साल पहले ऑडिशन लिया था। किसी दूसरे काम के लिए। बहुत लंबा ऑडिशन था वो। करीब डेढ़ घंटे का। उस वक्त उन्होंने काम भी ऑफर किया था। मैं उन्हें काफी वक्त से जानती हूं। उनकी प्रशंसक हूं। उनके साथ एक कंफर्ट लेवल था। अब इतने साल बाद मेरे कास्टिंग डायरेक्टर ने मेरा प्रोफाइल उनके पास भेजा तो उन्होंने पूछा कि तुम कहां थी। उन्होंने फिर से ऑडिशन लिया। लेकिन, चार साल पहले का ऑडिशन इतना लंबा था कि उन्हें बहुत कुछ बातें याद थीं। और मेरा यकीन है कि वो दृश्यों को बोल्ड रखने के रुप में अश्लीलता नहीं दिखा सकते। वो जब दृश्य समझाते हुए उदाहरण देते हैं तो कहते हैं कि ऐसा करो जैसे हेमामालिनी करती थी...या कुछ इसी तरह के। वह नायिकाएं केवल अपना बदन दिखाने के लिए नहीं जानी जाती। हेमा जी जब डांस करती हैं तो सब जानते हैं कि क्या होता है। तिग्मांशु ऐसे ही उदाहरण देते हैं। फिर इस किरदार में पुराने जमाने की नायिकाओं सरीखा एक ग्रेस चाहिए था। कंफर्ट लेवल था, इसलिए निभा पाई। बॉलीवुड में जब हम संघर्ष करते हैं तो दरअसल संघर्ष इसी बात का होता है कि जब हमें मौका मिले तो वो मौका हम न गंवाए। कोई यह न कहे कि यह लड़की या लड़का फलां किरदार में कंफर्ट फील नहीं कर रहा। यह कंफर्ट एक सेकेंड में आना चाहिए। मुझे लगता है कि पहले यानी करीब दो साल पहले भी यह रोल मिला होता तो शायद ऐसे नहीं कर पाती । मैं अब कॉन्फिडेंट हूं। हर तरह से। इसलिए आसानी से हुआ। मैं खुद को साबित कर पाई। वरना, जिमी शेरगिल के साथ मेरा कोई परिचय नहीं था। शूटिंग के दौरान तक सिर्फ उन्हें 'हाय-बाय' तक जानती थी। लेकिन, निर्देशक के विश्वास और मेरी मेहनत ने इस किरदार को ठीक से निभाने में मदद की।
चलिए, अब शुरुआत से बात करते हैं। एक्टिंग में आना कैसे हुआ।
जवाब-मैं बिहार के मुजफ्फरपुर की हूं। मेरा जन्म वहीं हुआ। उसके बाद बचपन जयपुर और दिल्ली में गुजरा। एक्टिंग से कोई लेना देना नहीं था। पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई की पूरी जिंदगी। मेरे पिता वकील हैं, लेकिन पढ़ाते भी हैं। मां भी अकादमिक क्षेत्र से हैं। पूरे परिवार का शिक्षा से संबंध है। कॉलेज में शौकिया तौर पर इंग्लिश नाटकों में हिस्सा लेना शुरु किया। उस वक्त मम्मी पापा ने इस पर गौर ही नहीं किया था। शुरुआती दौर से कुछ दबाव था कि आपको यह करना है...या ऐसे करना है। लेकिन ड्रामा ने मुझे मौका दिया कि मैं क्या करना चाहती हूं। मुझे खुद को एक्सप्लोर करने का मौका दिया। आपके सारे दोस्त जब एमबीए या मेडिकल में जा रहे हों तो आप भी जाना चाहते हैं। मैं भी उसी चाल में थी। लेकिन थिएटर ने खुद को समझने का मौका दिया और लगा कि मैं कुछ अलग भी कर सकती हूं। इसके बाद लगा कि एक्टिंग ही करनी है तो फिर अपना फलक खोलना होगा। मैं मुंबई आ गई।
आपने कॉलेज की पढ़ाई कहां से की।
जवाब-दिल्ली के हिन्दू कॉलेज से।
आपका डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद से भी संबंध है?
जवाब-मैंने खुद को स्थापित करने के लिए बहुत मेहनत की है। कई बार मुझे दरवाजे से गेट-आउट बोला गया। लेकिन, मैंने कभी अपने परिवार का नाम नहीं लिया। मैं जो करना चाहती थी, अपने बूते पर। मेरे एक चाचा हैं तो उन्होंने अभी फोन किया कि अरे तुम एक्ट्रेस बन गई हो...। किसी पत्रिका ने मेरा फोटो छापा था तो उसे देखकर फोन किया था। मैंने कभी नहीं बोला कि मैं किसकी बेटी या किसकी पोती हूं। मैं अपनी सफलता को सिर्फ अपना चाहती हूं। एक्टिंग सिर्फ एक कदम हैं जिंदगी में। बॉलीवुड जिंदगी का स्कूल है। किस तरह जिंदगी चलती हैं...कैसे लोग रहते हैंवो अंडरस्टैंडिंग बॉलीवुड में मिलती है। हां, मैं डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की परपोती हूं लेकिन मुझे नहीं लगता कि वह भी कभी चाहेंगे कि उनके बच्चे और परिवार के लोग उनके नाम का इस्तेमाल कर आगे बढ़ें। मैंने कभी उनके नाम का जिक्र नहीं किया क्योंकि इससे मुझे लगता है कि मेरी मेहनत पर पानी फिर जाएगा।
कभी लगा नहीं कि राजनीति की जाए। खासकर कॉलेज के दिनों में।
जवाब-कॉलेज के दिनों में तो सिर्फ यही चलता रहा कि आपसे जो अपेक्षाएं हैं, उन्हें पूरा करना है। इस बीच, मेरे भीतर खुद का एक संघर्ष चल रहा था। राजनीति मेरे दिमाग में है। लेकिन, मुझे हर चीज अपने तरह से करनी है। मुझे थिएटर से प्यार था और लगा कि इसमें करियर बना सकती हूं तो इसे चुन लिया। अब धीरे धीरे कदम बढ़ा रही हूं। मैं मुजफ्फरपुर से हूं और मेरा सपना है कि मैं वहां लौटूं। मैं वहां रहकर कुछ करुं।
बॉलीवुड में पहचान बनाना कितना मुश्किल है....नए कलाकार के लिए। क्योंकि मुझे याद है कि आपने जागरण फिल्म फेस्टविल में कहा था कि निर्माता कहते हैं कि आपमें 'नमक' नहीं है।
जवाब-देखिए, जब भी कोई नया कलाकार इंडस्ट्री में दाखिल होता है तो उसे खुद को साबित करना होता है। एक बार आप फेमस हो गए तो लोगों को आपकी क्वालिटी या गुण अपने आप दिखने लगते हैं। वरना, आप क्या होते हैं? कुछ भी नहीं। आप हजारों की भीड़ में सिर्फ एक शख्स हैं। बहुत कम लोग नए लोगों में क्वालिटी देख पाते हैं। तिग्मांशु सर ने देखी तो ले लिया। वरना, लोगों का फोकस होता है कि आपकी नाक ठीक नहीं है। अगर आपके बाल स्ट्रेट होते है तो अच्छा होता। आपकी आंखें बड़ी हैं,छोटी होनी चाहिए थीं। अरे...ये क्या मेरे हाथ में हैं कि मेरी आंखें बड़ी हैं या मेरे बाल 'कर्ली ' हैं। पर हां, जैसे ही बड़े लोगों के बच्चे उनके पास जाएंगे तो उन्हें अचानक उनमें क्वालिटी दिखने लगेगी। जिंदगी की सच्चाई इंडस्ट्री में घुसते ही पता चल जाती है।
आपने तेलुगु फिल्मों में भी काम किया है। कितनी फिल्मी की हैं वहां। और अब क्या इरादा है।
जवाब- देखिए, मैंने सिर्फ एक फिल्म की है वहां। मुझे तेलुगु फिल्म की एक्ट्रेस बोला जा रहा है, जो गलत है। उस फिल्म का भी मुंबई में ऑडिशन हुआ था। तेलुगु में दो तरह की सेंसेबिलिटी की फिल्में बनती हैं। एक बहुत अच्छी और संवेदनशील होती हैं। दूसरी, उस तरह की, जो मेरी सेंसिबिलिटी नहीं है। फिर मैं वहां नहीं गई। फिलहाल पूरा ध्यान बॉलीवुड पर है। यहां काफी अच्छी फिल्में बन रही हैं।छोटे बजट की फिल्में भी लगातार लोगों को पसंद आ रही हैं।
सीधा सवाल है कि अगर आपके छोटे बजट की फिल्में मिलती हैं, अच्छा किरदार मिलता है, लेकिन पैसा नहीं तो आप क्या करेंगी। आजकल नए निर्देशकों के पास अच्छे कॉसेप्ट हैं,लेकिन पैसा नहीं। और कलाकारों को तो पैसा चाहिए।
जवाब-देखिए, मुंबई में हम लोग रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं तो यह हमारा निवेश ही है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे बहुत पैसा चाहिए। पैसा जरुरी है, लेकिन किरदार सबसे महत्वपूर्ण है। आखिर, किरदार से हमें पहचान मिलती है। अगर रोल अच्छा है तो पैसा बहुत बाद की चीज है।
टेलीविजन में भी आपने काम किया है, तो अब मुमिकन है कि आपको बेहतर रोल मिलें टीवी में। तो क्या सोच रही हैं।
जवाब- मैंने टीवी में काम किया है। यशराज का टेलीविजन सीरियल पाउडर किया। फिर एक सीरियल 'किस्मत' था। ये सीरियल नहीं बल्कि 26 एपिसोड का टेलीसीरियल् था। मतलब तीन महीने के लिए आया और चला आया। पाउडर में बड़ा रोल था मेरा। इस रोल के बाद ही फिल्म की कास्टिंग के लिए बुलावा आने लगा। मैंने 2009-10 में किया पाउडर। एक साल तक शूट किया गया और तीन महीने में खत्म हो गया।
 
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