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लिपस्टिक अंडर माई बुरका : बोल्ड के नाम पर हॉट सीन की भरमार

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फिल्म समीक्षा
मुंबई। सेंसर बोर्ड के साथ विवादों में फंसी रही प्रकाश झा प्रोडक्शन की फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुरका’ पहली नजर में महिलाओं की आजादी और सम्मान के साथ उनके हक की लड़ाई का चेहरा बनती है, लेकिन जल्दी ही समझ में आ जाता है कि मामला इतने भर तक का नहीं है। दरअसल कहानी की बुनियाद महिलाओं की सेक्सुलियटी को लेकर है, जिसमें 55 साल की प्रौढ़ा से लेकर 18 साल की नवयुवती तक शामिल हैं।

कहानी भोपाल की चार महिलाओं की हैं, जो एक दूसरे के पड़ोस में रहती हैं। पहली महिला ऊषा (रत्ना पाठक शाह) हैं, जो मुहल्ले में बुआजी के नाम से जानी जाती हैं। दूसरी महिला शीरिन (कोंकणा सेन शर्मा) हैं, जिसके शौहर दुबई में काम करते हैं और शीरिन सेल्स गर्ल के तौर पर कमाती है, ताकि बच्चों की परवरिश कर सके। शौहर के लौट आने के बाद शीरिन की जिंदगी परेशानियों में घिर जाती है। तीसरी महिला लीला (आहना कुमार) है, जिसका अफेयर एक फोटोग्राफर के साथ है और उसकी शादी कहीं और तय हो जाती है। चौथी महिला कॉलेज जाने वाली रेहाना (प्लबिता) है, जो घर से बुर्का पहनकर निकलती है और कॉलेज में जींस पहनकर पहुंचती है।

एक दूसरे के पड़ोस में रहने वाली ये चारों महिलाएं अपने-अपने हालात में जकड़ी दिखाई गई हैं। बुआजी को चोरी छिपे फंतासी नॉवेल पढ़ने का शौक है, जिसमें सेक्सुअल कटेंट होता है। शीरिन का शौहर लौट आता है और अपनी पत्नी के साथ जबरन सेक्स करने में गुरेज नहीं करता। वहीं घर से बाहर उसका किसी और महिला के साथ भी अफेयर चल रहा है। लीला इस उलझन में कैद है कि जिसके साथ शादी होने जा रही है, उसके साथ रहूं या जिसके साथ अफेयर है, उसके साथ रहूं। रेहाना को जींस पहनने के अलावा पॉप, जैज गाने का शौक है। ऊंचे शौक पूरे करने के लिए रेहाना शहर के मॉल्स से चोरी करने से भी परहेज नहीं करती और एक दिन जेल पहुंच जाती है।

फिल्म की निर्देशिका अलंकिृता श्रीवास्तव ने फिल्म को बोल्ड बनाने के इरादे से ही पटकथा तैयार की और हरसंभव तरीके से बोल्डनेस के नाम पर सेक्सुअल कटेंट से फिल्म को भर दिया। फिल्म महिलाओं की घुटन, पुरुषत्व की सत्ता और उनकी आजादी जैसे मुद्दों की वकालत करती है, लेकिन इन सबको सेक्स के साथ जोड़ने से मामला कहीं से कहीं पहुंच जाता है। आखिर ये तो नहीं माना जा सकता कि महिलाओं की आजादी और अत्याचार के सारे मुद्दे सेक्स से ही जुड़े होते हैं। खास तौर पर 55 साल की महिला की सेक्सुअल्टी इस फिल्म का सबसे दुर्लभ हिस्सा है, जो इससे पहले किसी भारतीय फिल्म में तो शायद ही नजर आया हो।

महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वत्रंता को लेकर फिल्में पहले भी बनी हैं और आगे भी बनती रहेंगी, लेकिन इन तीनों मुद्दों को लेकर अलंकिृता श्रीवास्तव ने जो बनाया है, उसमें इस मुद्दे से कहीं ज्यादा सेक्स पर फोकस किया गया है और यही फिल्म की सबसे बड़ी गड़बड़ है और बहस का मुद्दा भी यही है।

परफॉरमेंस की बात करें, तो चारो मुख्य किरदारों में रत्ना पाठक शाह और कोंकणा सेन शर्मा की अदायगी के बारे में तो हर कोई जानता है, आहना कुमार और प्लबिता ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। अपनी-अपनी जगह चारों महिला कलाकारों का अभिनय दर्शनीय है। निर्देशक के तौर पर अलंकिृता श्रीवास्तव ने बोल्ड फिल्म बनाई है, लेकिन यहां बोल्डनेस का सीधा सा मतलब सेक्सुअल कटेंट से है। महिला अधिकारों की पैरवी करने वाला हर व्यक्ति सेक्सुअल कटेंट से आगे जाकर फिल्म की कहानी से जुड़ेगा, लेकिन असली बाधा यही है कि इस बोल्ड कटेंट में आप कितना भरोसा रखते हैं।

फिल्म का बोल्ड कटेंट महानगरों में महिलाओं की आजादी के समर्थन वाली युवा पीढ़ी को आकर्षित करेगा, तो हॉट सीन छोटे केंद्रों पर मसालेदार दर्शकों को खुश करेंगे, फिर भी बॉक्स ऑफिस पर ऐसी फिल्मों से कामयाबी की बड़ी उम्मीद नहीं रहती। बॉक्स ऑफिस पर ये फिल्म सीमित कारोबार ही कर पाएगी।

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