राष्ट्रपति चुनाव: रोचक मोड़ पर रायसीना हिल्स की जंग
By dsp bpl On 19 Jun, 2017 At 04:13 PM | Categorized As भारत | With 0 Comments

नई दिल्ली। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का खिताब रखने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए बिहार के राज्यपाल और बतौर राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को देखना उतना भी आसान नहीं है, जितना इसे समझा जा रहा है।

देश के तमाम सूबों में फ़तह हासिल करने के बाद भाजपा के लिए एक बार फिर से चुनाव में बादशाहत कायम करने की चुनौती है। इस मर्तफा ये चुनौती रायसीना हिल्स जीतने की है। सीधे शब्दों में कहें तो देश में 17 जुलाई को 19 वें राष्ट्रपति चुनाव होना है जिसको लेकर इस समय पक्ष के साथ विपक्ष भी अपने तरकश में तीर तराश रहे हैं। मसलन जिसका प्रत्याशी जितना दमदार-रायसीना में उसकी जयकार।

विपक्षी दल (कांग्रेस को छोड़कर सभी) जानते हैं कि उसके 36 फीसदी वोट इस चुनाव को बदलने में कितने कारगर हैं। यही वजह है कि सत्तारूढ़ बीजेपी, और प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस, दोनों ने इस वोटबैंक को अपने साथ मिलाने की कवायद तेज कर दी है।
अगर दूसरी विपक्षी पार्टियां कांग्रेस का समर्थन करती हैं तो कांग्रेस इस हिसाब से अपने 15.90 फीसदी वोट के साथ 51.90 फीसदी वोट का आंकड़ा पा लेगी जो एनडीए के 48 फीसदी वोट से 3.90 फ़ीसदी ज्यादा है। ऐसे में भाजपा के लिए इस गणित को हल करना मुश्किल हो जाएगा।

इसी वजह के चलते कई दिनों से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह नाश्ता पुणे में तो डिनर केरल में कर रहे हैं। कभी-कभी तो सहयोगियों को मनाने के लिए उन्हें तीन-तीन दिन महाराष्ट्र में रुकना पड़ा है।

अभी भी मुश्किल इस बात को लेकर है कि भाजपा राष्ट्रपति चुनाव में कम पड़ रहे 20,000 वोटों को क्या आसानी से पा लेगी?
फिलहाल आंकड़ों से आइस – पाइस खेलने वाली भाजपा को इस गणित को समझने के लिए दिमागी कसरत करनी पड़ेगी। अगर आंकड़ों पर नजर डाले तो दोनों सदनों के मौजूदा 748 सांसदों, 4852 कुल विधानसभाओं से सब मिलाकर लगभग 10,98,882 वोट नए राष्ट्रपति के नाम पर मुहर लगाएंगे। मतलब साफ है कि अगर भाजपा को ये ताज पाना है तो उसे 5,49,442 वोटों की दरकार रहेगी। लेकिन मौजूदा स्थिति में भाजपा के पास महज 5,27,371 ही वोट हैं जो 22,071 वोटों की कमी के साथ विपक्ष को उसकी पसंद का राष्ट्रपति चुनने का भरपूर मौका दे सकते हैं। वैसे भी नोटबंदी और लगातार पूरे देश में उग्र हो रहे किसान आंदोलनों ने भाजपा की मुश्किलें पहले ही बढ़ा रखी हैं। साथ ही जीएसटी लागू करवाने के बाद से व्यापारी वर्ग भी पार्टी से अलग- थलग होता दिख रहा है। ऐसे में मौका कम ही है कि विपक्षी पार्टियां एनडीए के साथ कदमताल करें। इसलिए अब भाजपा के लिए ये जरूरी हो गया है कि अपने सहयोगियों को तरजीह देते हुए कुछ एक छोटी विपक्षीय पार्टियों को अपने साथ मिलाना पड़ेगा। वरना चक्रव्यूह के छह दरवाजे तोड़ने के बाद भी भाजपा सातवें दरवाजे पर फंस सकती है और शायद इस बात को बखूबी समझते हुए भाजपा ने ‘मान मनौवल’ का दौर शुरू कर दिया है।

Leave a comment

XHTML: You can use these tags: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>