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शासन-प्रशासन और मजदूर

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1493447613-1177आज मजदूर दिवस पर सुबह जैसे ही अखबार उठाया और उसमें यह खबर पढ़ी, निश्चित ही वह देश के मजदूरों के वर्तमान हालातों को बयां करते हुये दिखाई देती है । जिसके अनुसार एक खेत मालिक ने अपने यहां नौकर को अपने कुत्ते से मरवा डाला । यहां तक कि वह कुत्ता उसका 25 परसेंट मांस तक खा गया । दूसरी घटना कुछ दिनों पहले आई मध्‍यप्रदेश के मंदसौर जिले की है जिसमें एक व्यापारी के द्वारा मातहत कर्मचारी को वेतन ना देने के कारण उस कर्मचारी ने विवश होकर आत्महत्या कर ली थी ।

वस्‍तुत: आज मजदूर दिवस के उपलक्ष में इन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देश में मजदूरों की हालत बयां हो गई है। हम आज भी पूंजीवाद के इस दौर में दास प्रथा भरपूर दोहन कर रहे हैं। यहां तक की सरकार द्वारा पंजीकृत संस्थाये भी जिसमें प्राइवेट स्कूल जो नैतिक शिक्षा का भी केंद्र होते हैं वहां पर भी शिक्षकों को सिर्फ आधा पेट भरने तक का ही वेतन दिया जा रहा है। जबकि इन स्कूलों को चलाने वाले मालिक करोड़पति होकर समाज में शिक्षाविद बनके घूम रहे हैं। इसी प्रकार से कई निजी कंपनियां खासकर जहां मजदूरों की आवश्यकता होती है मजदूरों को अपने यहां सीधे भर्ती ना कर के ठेकेदारों के माध्यम से काम करवाती है जिससे उनकी सरकारी जवाबदारी और श्रम कानूनों से पूरी तरह छुटकारा मिल जाता है ।

हमारे देश श्रम विभाग सिर्फ और सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकारों की रक्षा हेतु दिखावे के विभाग बनकर रह गए है। इनका काम सिर्फ रविवार को बाजार बंद करा कर छोटे-मोटे व्यापारियों को डराकर श्रमिकों की चिंता का ढकोसला मात्र रह गया है अभी भी हमारे यहां पर स्वाभिमानी मजदूर जो भीख नहीं मांग सकते बहुत ही बुरी और दयनीय स्थिति में जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधि सिर्फ वोट की खातिर उनका दोहन ही कर रहे हैं साथ ही उनके हितों की रक्षा के लिए नौटंकी करके उनके मालिकों से चुनावी चंदा लेकर स्वयं गले में पट्टा डालकर कुत्तो के भाँति उनके वफादार बने हुए हैं। यह बहुत ही चिंता का विषय है जिसके लिए राजनीतिक पार्टियों और समाजवादियों को बहुत बड़ा आंदोलन की आवश्यकता है।

राजेश पाठक

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