1 मई का संदेश, दुनिया के मजदूर एक हो जाएं
By dsp bpl On 1 May, 2017 At 01:27 PM | Categorized As सम्पादकीय | With 0 Comments

majdoorजो मई दिवस दुनिया के मजदूरों के एक हो जाने के पर्याय से जुड़ा था,भूमण्लीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद वह किसान और मजदूर के विस्थापन से जुड़ता चला गया। मई दिवस का मुख्य उद्देश्य मजदूरों का सामंती और पूंजी के शिकंजे से बाहर आने के साथ उद्योगों में भागीदारी भी था। जिससे किसान-मजदूरों को राज्यसत्ता और पूंजी के षड़यंत्रकारी कुचक्रों से छुटकारा मिल सके। लेकिन भारत तो क्या वैशिवक परिप्रेक्ष्य में भी ऐसा संभव हुआ नहीं। यही कारण है कि करीब पौने दो सौ जिलों में आदिवासी व खेतिहर समाज में सक्रीय नक्लवाद भारतीय-राज्य के लिए चुनौती बना हुआ है। हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 26 जवानों को हमला बोलकर हताहत कर दिया। इसके पहले भी छत्तीसगढ़ में हुए दो हमलों में करीब एक सैंकड़ा से ज्यादा जवान मारे जा चुके हैं। नक्सली कुछ साल पहले ओड़िसा में भाजपा विधायक और छत्तीसगढ़ में कलेक्टर का अपहरण करके नक्सलवाद ने संविधान के दो स्तंभ विधायिका और कार्यपालिका को सीधी चुनौती पेश कर दी थी। दरअसल कथित औद्योगिक विकास के बहाने वंचित तबकों के विस्थापन का जो सिलसिला तेज हुआ है,उसके तहत आमजान आर्थिक बदहाली का शिकार तो हुआ ही,उसे अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के भी संकट से जूझना पड़ रहा है। मसलन एक ओर तो उसकी अस्मिता कुंद हुई जा रही है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक नीतियों ने उसकी आत्मनिर्भरता को परावलंबी बनाकर आजीविका का संकट पैदा कर दिया है।

फिरंगी हुकूमत के पहले भारत में यूरोप जैसा एकाधिकारवादी सामंतवाद नहीं था और न ही भूमि व्यक्तिगत संपत्ती थी। भूमी व्यक्गित संपत्ती नहीं थी, इसलिए उसे बेचा व खरीदा भी नहीं जा सकता था। किसान भू-राजस्व चुकाने का सिलसिला जारी रखते हुए भूमि पर खेती-किसानी कर सकता था। यदि किसान खेती नहीं करना चाहता है तो गांव मे ही सामुदायिक स्तर पर भूमि का आंवटन कर लिया जाता था। इसे माक्र्स ने एशियाई उत्पादन प्रणाली नाम देते हुए किसानी की दृष्टि से श्रेष्ठ प्रणाली माना था। किंतु अंग्रेजांे के भारत के वर्चस्व के बाद भू-राजस्व व्यवस्था में दखल देते हुए भूमि के साथ निजी स्वामित्व के अधिकार जोड़ दिए। भूमि के निजी स्वामित्व के इस कानून से किसान भूमि से वंचित होने लगा। इसके बाद किसान की हालात लगातार बद्तर होती चली गई। वामपंथी माक्र्सवदियों ने दुनिया के मजदूरों एक हो का नारा दिया, इसके उलट राष्ट्रीय स्वयं सेवक संगठन के आनुषांगिक संगठन “भारतीय मजदूर संघ” के संस्थापक नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी ने नारा दिया था कि “आओ दुनिया को एक करें।“ इस नारे में जहां विश्व एकता की झलक मिलती है, वहीं माक्र्स के नारे में वर्ग संघर्ष का भेद स्पष्ट नजर आता है। यही वजह रही कि जिस सोवियत संघ से मजदूरों के एक होने की बात उठी थी, वह सोवियत संघ कई टुकड़ों में विभाजित हो गया।

आजादी के बाद सही मायनों में खेती, किसानी और मजदूर के बाजिव हकों को इंदिरा गांधी ने अनुभव किया नतीजतन हरित क्रांती की शुरूआत हुई और कृषि के क्षेत्र में रोजगार बढ़े। 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा निजी बैकों और बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इस व्यवस्था में किसानों को खेती व उपकारणों के लिए कर्ज मिलने का सिलसिला शुरू हुआ। श्क्षिित बेरोजगारों को भी अपना लघु उद्योग लगाने के लिए सब्सिडी के आधार पर ऋण दिए जाने की मुकम्मल शुरूआत हुई। परिणामस्वरूप आठवें दशक के अंत तक रोजगार और किसानी के संकट धरातल पर हल होते नजर आए। लिहाजा ग्रामीणों में न तो असंतोष देखने को मिला और न ही शहरों की और पलायन हुआ। नरेन्द्र मोदी सरकार स्टार्टअप और डिजीटल इंडिया के माध्यम से युवाओं को रोजगार के यही उपाय कर रही है।

इंदिरा गांधी के बाद ग्राम व खेती किसानी को मजबूत किए जाने वाले कार्यक्रमों को और आगे बढ़ाने की जरूरत थी, लेकिन उनकी हत्या के बाद उपजे राजनीतिक संकट के बीच राजीव गांधी ने कमान संभाली उनके विकास का दायरा संचार क्रांति की उड़ान में सिमटकर रह गया। बाद में पीवी नरसिंह राव सरकार के वित्त मंत्री डाॅं मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों के बहाने अमेरिकी नीतियों से उपजी नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करके किसान व मजदूर के हितों को पलीता ही नहीं लगाया, औद्योगिक और प्रौद्योगिक विकास के बहाने किसान मजदूर और आदिवासियों को विस्थापन के लिए विवश भी कर दिया। जिसके चलते भूमिहीनता बढ़ी और सीमांत किसान ऐसा शहरी मजदूर बनकर रह गया। आज उसके पास अपनी आवाज बुलंद करने के लिए किसी मजबूत संगठन की छत्रछाया ही नहीं बची रह गई है। बहुराष्ट्रीय उद्योगों में न तो उसकी नौकरी की गारंटी बची है और न ही काम करने के घण्टे तय हैं। मजदूरों के काम करने की जो कानूनी सीमा 8 घण्टे की है, उसके बदले में लोग 12 से 14 घण्टे तक काम करने को मजबूर हैं। उच्च शिक्षित भी अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बंधुआ मजदूर दिखाई देते हैं। यह स्थिति बेरोजगारी का भी एक बड़ा कारण बन रही है। क्योंकि एक व्यक्ति जब दो लोगों का काम करेगा तो नये लोगों को रोजगार कैसे मिलेगा ? सरकार को इस बाबत सख्त कानूनी उपाय अमल में लाने की जरुरत है।

महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई में केवल सत्ता हस्तांतरण के लिए नहीं, व्यवस्था परिवर्तन के लिए लड़ी थी। क्योंकि अंग्रेजों द्वारा बनाई गई प्रशसनिक, शैक्षाणि, राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था भारत को कमजोर करके भारतीयों पर राज करने के लिए बनाई गई थी। इस नाते 1935 में भारत शासन अधिनियम को वजूद में लाकर एक ऐसी व्यवस्था बनाई जो ‘‘बांटों और राज करो’’ के कुटिल सिद्धांत को अमल में आने वाली थी इस व्यवस्था ने सामाजिक समरसता को तोड़ते हुए, समाज की परस्पर जोड़ने वाली कड़ियों को दुर्बल बनाते हुए शासन-प्रशासन व्यवस्था को शक्तिशाली और निरकंुश बना दिया है। नतीजतन लोकतंत्र की जिस व्यवस्था से भी हम नेता चुनते हैं, वह कुर्सी पर बैठते ही अंग्रेजों की व्यवहार करने लग जाता है। जनता को बांटता है, लूटता है और सिर्फ राजनीति करता है। अधिकारी और कर्मचारी इसी लूट प्रणाली को औजार बनाकर जनता के शोषण में भागीदार बनते हैं। इसी कारण उससे जल, जंगल और जमीन छीनने में आसानी तो हुई ही, जो शिक्षित तबका था, उसे भी सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकिरियों में संविदा कर्मचारी बनाकर उसे बंधुआ मजदूर बनाने का काम करती है। वैश्वीकरण के बाद ये हालात इतने नाजुक हो गए कि शोषण से जुड़ा कोई भी वर्ग अपने हितों के लिए आवाज भी बुलंद नहीं कर पा रहा है। आज वे सभी राजनैतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठन नदारद हैं, जो कभी मजदूरों के हितों के लिए लाल झंडा उठाये फिरते थे। गोया समय की पुकार है कि किसान एवं मजदूर को फिर से जल जंगल और जमीन से जोड़ा जाकर प्राकृतिक संपदा के दोहन के आधार पर विकास की अवधारणा पर लगाम लगाई जाए।

प्रमोद भार्गव

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