फिल्म समीक्षा- ‘पूर्णा’
By dsp bpl On 31 Mar, 2017 At 03:13 PM | Categorized As मनोरंजन | With 0 Comments

मुंबई,। ये देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि 13 साल की एक बच्ची दुनिया के सबसे बर्फीले पहाड़ पर चढ़ जाती है और देश की मीडिया इस तरफ ध्यान नहीं दे पाता। आंध्र प्रदेश और अब तेलंगाना की रहने वाली पूर्णा मलावत की जिंदगी पर अगर राहुल बोस ने ये फिल्म न बनाई होती और उस बहादुर लड़की के उस कारनामे को परदे पर न उतारा होता तो उस लड़की के बारे में लोगों को पता नहीं चल पाता, इस फिल्म को देखने के बाद हर देशवासी पूर्णा पर फख्र महसूस करेगा। संघर्ष की जमीन पर बेमिसाल कामयाबी का इतिहास रचने वाली इस लड़की की जिंदगी पर फिल्म बनाने के लिए राहुल बोस को साधुवाद।

ये फिल्म बॉलीवुड की मसाला फिल्मों की कैटेगिरी में कहीं फिट नहीं बैठती। न ही ये फिल्म इसलिए बनाई गई है। ये फिल्म जिस मकसद के लिए बनाई गई है, उससे भी ज्यादा आगे जाकर ये फिल्म उम्मीद की हर कसौटी पर खरी उतरती है। राहुल बोस ने अगर फिल्म के प्रमोशन को लेकर थोड़ा गंभीरता से सोच लिया होता, तो ये फिल्म ज्यादा लोगों तक जल्दी पहुंच सकती थी।

अब फिल्म की कहानी की बात की जाए, तो बेहद धीमे रफ्तार से शुरू हुई ये फिल्म पहले आईपीएस पुलिस अफसर परवीन कुमार (राहुल बोस) से शुरू होती है, जो सोशल वर्किंग वाले डिपार्टमेंट में आकर गांवों के छोटे स्कूलों में मिड डे मिल और वहां के बच्चों के स्कूलों में न आने की गंभीर समस्या को सुलझाने की कोशिश करता है। एक बेहद गरीब गांव के गरीब परिवार की दो लड़कियां स्कूल में जाकर पढ़ाई करना चाहती हैं, लेकिन पैसों की तंगी उनके परिवार के आड़े आ जाती है। पूर्णा (अदिति ईनामदार) उनमें से एक है। उसकी बड़ी कजिन बहन हालात का शिकार होकर घरवालों की मर्जी के शादी कर लेती है। पूर्णा को एक सरकारी स्कूल में दाखिला मिल जाता है। वहां से भागना भी चाहती है, लेकिन परवीन कुमार उसे स्कूल वापस ले आते हैं। परवीन कुमार की कोशिशों से स्कूल में मिड डे मिल की हालत भी सुधरती है और बच्चों को पढ़ाई के अलावा दूसरी एक्टिवटी शुरू हो जाती हैं, जिसके तहत पूर्णा सहित दूसरे बच्चों को पहाड़ चढ़ने का पहला मौका मिलता है और इस मौके के बाद पूर्णा लगातार आगे बढ़ती चली जाती है। तमाम विषम परिस्थितियों से जूझकर पूर्णा सबसे छोटी उम्र में दुनिया की सबसे बर्फीली चोटी पर चढ़ने का इतिहास रच डाला।

ये रुटीन बॉलीवुड की मसाला फिल्म नहीं हैं, इसलिए फिल्म की कमियों और खूबियों की बात करने से ज्यादा बड़ी बात ये है कि रेगुलर प्रोड्यूसर न होने के बाद भी राहुल बोस ने इसे बनाने का जोखिम लिया और बहुत ईमानदारी से उन्होंने इसे कमर्शियल मसालों से दूर रखा, जो बहुत बड़ी कामयाबी मानी जाएगी और ये फिल्म की सबसे बड़ी खूबी भी है। दूसरी बड़ी खूबी पूर्णा के किरदार में अदिति ईमानदार का लाजवाब परफॉरमेंस, जो इससे बेहतर नहीं हो सकता था। खुद राहुल बोस ने आईपीएस अफसर के रोल में बखूबी काम किया। फिल्म को नेचुरल और रियल रखने में राहुल और उनकी टीम ने जो मेहनत की, उसकी तारीफ करना जरुरी है। पहले हाफ में धीमी शुरूआत के बाद भी दूसरे हाफ में फिल्म जबरदस्त ग्रिप पकड़ती है और क्लाइमैक्स में तो सांसे रोकने तक का थ्रिल महसूस कराने में कामयाब हो जाती है।
फिल्म में कमियां नहीं हैं, ऐसा नहीं है, लेकिन जिस तरह के सबजेक्ट पर राहुल बोस ने जिस तरह से फिल्म बनाने में ईमानदारी रखी है, उसे देखते हुए कमियों पर ज्यादा गौर करना जरुरी नहीं। जो भी दर्शक कमर्शियल फिल्मों के दायरे से जाकर एक ईमानदारी के साथ बनी फिल्म को देखकर पूर्णा की उपलब्धि पर नाज करना चाहता है, वो इस फिल्म से निराश नहीं होगा। राहुल बोस को ऐसी फिल्म के लिए एक बार फिर बधाई।

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