फिल्म समीक्षा- ‘नाम शबाना’
By dsp bpl On 31 Mar, 2017 At 03:15 PM | Categorized As मनोरंजन | With 0 Comments

मुंबई । निर्माता और निर्देशक के तौर पर नीरज पांडे ने फिल्म बेबी में क्राइम-थ्रिलर के साथ-साथ देशभक्ति के मसालों की ऐसी पैकेजिंग की थी कि दर्शकों ने बेबी को हाथों हाथ लिया था। बिना किसी पहचान के देश की सुरक्षा में लगी बेनामी एजेंसी के मेंबर के तौर पर अक्षय कुमार से लेकर अनुपम खेर और तापसी पन्नू के किरदारों को लेकर बेबी की प्रीक्वल के तौर पर एक और फिल्म बनाने का आइडिया अच्छा था।

इस आइडिए पर फिल्म बनाने के लिए नीरज पांडे ने निर्देशन शिवम नायर को सौंप दिया और नाम शबाना नाम से तापसी पन्नू के किरदार को केंद्र में रखकर फिल्म तैयार की, जो बेबी का हिस्सा रही थी। शबाना ने अतीत का सफर कराने वाली इस फिल्म को महिला प्रधान बनाने के लिए उन सारे मसालों को इस्तेमाल किया गया, जिससे शबाना का किरदार दमदार बने। शबाना के किरदार को दमदार बनाने के लिए बेबी की टीम से अक्षय कुमार और अनुपम खेर के किरदारों की भी मदद ली गई। एक खूंखार टाइप विलेन का किरदार भी गढ़ा गया और नीरज पांडे की लेखनी यहीं आकर मार खा गई। शबाना का किरदार तो पावरफुल बन गया, लेकिन फिल्म कमजोर बनती चली गई। शबाना ही शबाना का गुणगान करने के चक्कर में नीरज पांडे बतौर लेखक फिल्म की कहानी में संतुलन साधने में फेल हो गए और ये कमजोरी शबाना की तमाम खूबियों पर भारी पड़ती चली गई।

बेबी से शबाना की तुलना की जाए, तो बेबी की सबसे बड़ी खूबी थी, तीन अलग अलग वारदातों में तीन अलग अलग ऐसे किरदारों का खात्मा, जो देश के दुश्मन थे। चौथे किरदार को दुबई से भारत लाने की कवायद लाजवाब थी। इन सभी घटनाओं में थ्रिल का मूमेंट कुर्सी के हिलने भी नहीं देता था। इस बार सिर्फ एक अपराधी को गिरफ्त में लाने के लिए जो प्लान बनाया गया, उसमें न तो शुक्ला जी (अनुपम खेर) कुछ कर पाए, न अक्षय कुमार का किरदार ज्यादा कुछ खास कर पाया। एक लाइन में कहें, तो बेबी में सब कुछ स्वाभाविक सा था, इस बार सब कुछ फिल्मी बना दिया और वो भी आनन-फानन में, जिसमें ये भी तय नहीं कर पाए कि इसमें हीरो अक्षय कुमार को बनाना है या शबाना को। शबाना का किरदार जमाने के लिए फिल्म के पहले हाफ का आधा समय ले लिया गया। उसके फ्लैशबैक को जरुरत से ज्यादा खींच दिया गया। शबाना की प्रेम कथा भी लंबी खिंची। शबाना को सिक्योरिटी एंजेसी से जोड़ने का तर्क गले ही नहीं उतरता। शबाना ने जिस बहादुरी से अपने प्रेमी के हत्यारे को ठिकाने लगाया, वहां भी तालियां बजाने का काम अक्षय कुमार को दे दिया गया। ऐसा लगता है कि नीरज पांडे ने बतौर लेखक शबाना सहित इस फिल्म के तमाम किरदारों को खुद को या अपने बॉस (अक्षय) को खुश करने के लिए बिना किसी लॉजिक के ठोक दिया। डैनी और मंत्री जी के पीए (मुरली शर्मा) के किरदार नुमाइश बना दिए गए।

ऐसा नहीं है कि फिल्म में खूबियां कम हैं। शबाना के किरदार को आज के दौर की युवती बनाने में कोई कसर नहीं रखी गई। वह एक ऐसी लड़की, जो किसी छेड़खानी को अनदेखा नहीं करती। घर की कलह के बाद भी वो आम लड़की बनी रहने का माद्दा रखती है। रोमांस को लेकर उसका अंदाज निराला नहीं है, लेकिन अस्वाभाविक नहीं है। इसके बाद शबाना का किरदार जैसे कराटे और सिक्योरिटी एजेंसी के लिए गढ़ा जाता है, इसकी वजह कमजोर होने के बाद भी वो प्रोसेस दिलचस्प है। अपने प्रेमी के कातिल को वो हीरो की तरह मारती है और शबाना का किरदार जैसे परदे को कब्जे में ले लेता है। तापसी पन्नू ने शबाना के किरदार की हर नब्ज को पकड़ा और खुद शबाना में ढ़लती चली गईं। पिंक के बाद ये उनकी अब तक की सेकेंड बेस्ट फिल्म है। तापसी के बाद इस फिल्म का दूसरा पिलर मनोज वाजपेयी हैं, जो अपने असरदार अभिनय से किरदार की कमजोरियों को ढांक देते हैं। सधी हुई संवाद अदायगी और आंखों के हुनर के साथ मनोज का किरदार दिलचस्प बना रहता है, क्लाइमैक्स छोड़कर, जहां उनका कोई रोल ही नहीं रह जाता। फिर भी वह दिलचस्प हैं। शबाना की मां का किरदार अधूरा है, लेकिन पावरफुल है। मेन विलेन में साउथ के कलाकार पृथ्वीराज सुकुमारन असरदार रहे हैं, लेकिन क्लाइमैक्स में जल्दी निपट गए। ये किरदार बेबी के तीनों विलेन वाले किरदारों के मुकाबले बेदम लगता है। रही बात अक्षय की, तो वे छोटे से रोल में हीरोज्म को बनाए रखते हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि उनको हीरो बनाने के चक्कर में शबाना सहित तमाम दूसरे किरदारों को कमजोर किया गया। फिर भी एक्शन सीनों में अक्षय अपने फैंस को खुश करने में कामयाब रहे।

लेखक के तौर पर नीरज पांडे और निर्देशक के तौर पर शिवम नायर अपनी अपनी जिम्मेदारी समझने में नाकाम रहे। खास तौर पर नीरज की असफलता ज्यादा घातक है। शबाना के किरदार में तापसी पन्नू के करियर को आगे बढ़ाने में कितनी कारगर साबित होती है, ये बॉक्स ऑफिस के नतीजे बताएंगे। फिलहाल महानगरों की लड़कियां शबाना के किरदार को देखकर खुश होंगी, यही फिल्म की उम्मीद है और मकसद भी। कहते हैं कि मिठाई खाने के बाद नमकीन खाना पसंद नहीं किया जाता। बेबी मिठाई थी और ये फिल्म नमकीन है।

Leave a comment

XHTML: You can use these tags: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>