एग्जिट पोल ने खोल दी पोल पट्टी
By dsp bpl On 10 Mar, 2017 At 02:15 PM | Categorized As सम्पादकीय | With 0 Comments

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

चुनाव परिणाम के लिए कुछ घंटो का इंतजार है, लेकिन एग्जिट पोल ने ही कई दिग्गजों की पोल-पट्टी खोल दी हैं। पराजय की जिम्मेदारी तय होने लगी, नेतृत्व को बचाने के जतन होने लगे, ठीकरा फोड़ने के लिए सिर की तलाश होने लगी, यहां तक की गठबंधन या समर्थन के पैगाम भी बनने लगे है। यह उनकी दशा है, जो डेढ़ दशक तक उत्तर प्रदेश में सत्ता के प्रमुख दावेदार रहे। अब बचाव का रास्ता तलाश रहे हैं। परिणाम चाहे जो हो कांग्रेस, सपा और बसपा की हताशा एग्जिट पोल से ही झलकने लगी। सबसे अधिक विचित्र दशा सपा खेमें में दिखायी दी। एक मंत्री ने पराजय के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के साथ गठबंधन न करना बड़ी भूल थी।

अखिलेश अकेले लड़कर सरकार बना सकते थे। एक अन्य दिग्गज मंत्री ने कहा कि पराजय के लिए केवल अखिलेश जिम्मेदार नहीं हैं, बात सही है। उनके जैसे लोग भी कम जिम्मेदार नही माने जायेंगे। रही सही कसर बसपा को समर्थन देने की बातों ने पूरी कर दी। स्पष्ट है एग्जिट पोल से ही सपा के तीन महत्वपूर्ण विचार सामने आ गए। एक कांग्रेस से गठबंधन करना आत्मघाती साबित हुआ। दूसरा हार की जिम्मेदारी से अखिलेश को बचाने का इंतजाम किया गया, तीसरा बसपा से गठबंधन का विकल्प खोल दिया गया। रविदास मेहरोत्रा के लिए यह कहना आसान है कि सपा अकेले लड़ती तो जीत जाती। इसके विपरीत सच्चाई यह थी कि सत्ता में आत्मविश्वास की कमी थी। वह जानते थे कि काम इतना नही बोल रहा है, जितना बताया जा रहा है। बतौर स्वास्थ्यमंत्री रविदास मेहरोत्रा भी इस हकीकत से कई बार परिचित हुए थे। पार्टी पर वर्चस्व स्थापित करना और आमजन का विश्वास जीतना दोनों अलग विषय है।

अखिलेश ने पार्टी पर निर्विवाद रूप से वर्चस्व बनाया था, लेकिन वह वास्तविकता से बेखबर नहीं थे। आजम खां का यह कहना ठीक है कि पराजय के लिए अखिलेश अकेले जिम्मेदार नही हैं। फिर भी सरकार के मुखिया की जिम्मेदारी निर्धारित होती है। साढ़े चार वर्ष तक अखिलेश पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी थे। इन साढ़े चार वर्षों तक साढ़े तीन मुख्य मंत्रियों के आरोप भी लगते रहे। अखिलेश ने इससे उबरने का कभी प्रयास नहीं किया। लोकसेवा आयोग और साथ ही अन्य सभी नियुक्तियों में जाति व क्षेत्रवाद के आरोप लगे। विधान परिषद के नामित सदस्य और लोकायुक्त चयन के प्रस्ताव राजभवन में संवैधानिक आधार पर रोके गए। इससे भी सरकार की छवि पर अच्छा प्रभाव नही पड़ा। मुख्यमंत्री विवादित व बड़बोले मंत्रियों को बर्दाश्त करते रहे। जाहिर है इन सबकी भी जिम्मेदारी होगी। अखिलेश से यह सवाल तो होगा कि उन्होंने वर्चस्व लगभग चली-चला के समय पर ही क्यों बनाया। यह कार्य प्रारम्भ में होता तो बात अलग थी।

सपा के प्रचार में कानून व्यवस्था की आधुनिक तकनीक की बात खूब दोहरायी गई। चुनाव के अंतिम चरण तक जमीनी सच्चाई अलग थी। तीसरी बात बसपा से गठबंधन की है। चुनाव के बाद न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर गठबंधन को व्यवहारिक माना जा सकता है। इसके विपरीत एग्जिट पोल के बाद ऐसी बातें करना अवसरवादी विचार है। ऐसे विकल्प खुले रखने के लिए तो अजीत सिंह प्रसिद्ध रहे हैं। क्या अखिलेश की सपा उसी दिशा से बढ़ना चाहेगी। इतना तय है कि सपा और कांग्रेस ने एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने का इंतजाम कर लिया है। कांग्रेस तो गठबंधन के साथ ही हास्यास्पद हो गयी थी। सत्ताइस साल यूपी बेहाल के बाद अकेले चुनाव लड़ने के अलावा अन्य कोई विकल्प नही था।

एग्जिट पोल से बसपा में भी बेचैनी दिखायी दी। चुनाव परिणाम चाहे जो हो, मायावती ने अपनी विश्वसनीयता बहुत कम कर ली है। चुनाव में मायावती ने पूरा जोर ब्राहमणों पर लगाया था। उन्होंने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई 2012 के विधानसभा व 2014 के लोकसभा में उन्हें भारी पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों को वरीयता में पीछे कर दिया। सतीश चन्द्र मिश्र की बात अलग थी। इस चुनाव में उन्होंने खुलकर मुसलमानों से वोट मांगे। इसका अर्थ यह निकाला गया कि मायावती केवल दलित मतदाताओं को अपना मानती हैं। इस बात की गारंटी क्या थी कि एक दिन ब्राहम्णों की भांति मुसलमानों को भी हटा नहीं देंगी। इन सबके विपरीत नरेन्द्र मोदी ने अपनी विश्वसनीयता, करिश्मा और ईमानदार मेहनती छवि बनाए रखा। एग्जिट पोल से भाजपा की यह छवि उभरना स्वाभाविक थी।

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