कम्युनिस्ट पार्टियों का स्मार्ट शहर विरोध ?
By dsp bpl On 4 Feb, 2017 At 01:22 PM | Categorized As सम्पादकीय | With 0 Comments

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (एम) हो या अन्य समाजवादी पार्टियां और इनसे जुड़े संगठन एवं संस्थाएं इन दिनों जिस तरह ये सभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट स्मार्ट सिटि और बुलेट ट्रेनों जैसे नवाचारों का एक स्वर में विरेाध कर रहे हैं। जिसे कि बाहर से सुनने पर ऐसा लगता है कि ये सभी बात बुल्कुल सही कह रहे हैं, यह ठीक वैसे ही है जैसे समाजवादी विचारधारा एवं उसकी बातें बाहर से सुनने पर जैसे सभी को अपनी ओर एक बार में ही सीधे आकर्षित करती प्रतीत होती हैं, किंतु जब उसका व्यवहारिक पक्ष अनुभव करते हैं और उसे तर्क की कसौटी पर कसते हैं तो समझ आता है कि ये विचारधारा सैद्धांतिक रूप से भले ही सही हो सकती है , लेकिन इसे व्यवहार में लाना असंभव है । नहीं तो जिस रास्ते पर कभी चीन और पूर्वी जर्मनी, सोवियत रूस, विएतनाम, पूर्वी युरोप के देश चेकोस्लाविया, पोलैण्ड जैसे कई देश चल पड़े थे वे भी वक्त के साथ समाजवाद को छोडक़र पूंजीवाद या लोकतंत्र का दामन न थाम लेते ?

कुछ लोग कह सकते हैं कि चीन तो अभी भी साम्यवादी ही है तो कहना होगा कि चीन में सरकारी सिस्टम, सरकार चुनने की प्रक्रिया आज भी साम्यवादी हो सकती है; चीनियों ने कम्युनिस्ट व्यवस्था बनाए रखी है, वह पार्टी स्तर और शासन स्तर पर ही है, किंतु चीन व्यवहार में पूरी तरह पूँजीवादी देश बन चुका है। यही हाल सोवियत रूस का हुआ, साम्यवाद के नाम पर संगठित यह गणराज्य समय के साथ ताश के पत्तों की तरह डह गया। यह पूँजी का प्रभाव ही था कि वह 90 के दशक में कई देशों में विभक्त हो गया । वस्तुत: 1917 में जिस बोल्शेविक क्रांति ने सोवियत संघ नामक एक नए साम्यवादी राज्य को जन्म दिया था उसके ठीक 73 सालों में ही सोवियत संघ को 26 दिसम्बर 1991 को विघटित घोषित कर दिया गया । पूर्वी जर्मनी का एकीकरण जर्मनी के साथ हुआ जोकि पहले से पूंजीवादी सिद्धांतों पर विश्वास करता था। यही हाल विएतनाम का हुआ है ।

चलिए, इसके इतर हम यहां बात कर रहे हैं स्मार्ट शहरों के विरोध की । वस्तुत: देखा जाए तो स्मार्ट शहरों या बुलट ट्रेनों का विरोध इस तरह की शक्तियों का अपने भविष्य का विरोध करना है जो किसी भी परिवर्तन को अपनी सत्ता बनाए रखने की दिशा में रोड़ा मानते हैं ।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (एम) की पूर्व सांसद सुभाषिनी अली सहगल हाल ही में अपने मध्यप्रदेश प्रवास पर आई थीं, जिसमें उन्होंने स्मार्ट शहरों का विरोध करते हुए कहा कि केंद्र की सरकार स्मार्ट सिटी के माध्यम से अब शहरों का निजीकरण करने में लगी है जिसमें पानी, स्वास्थ्य का पैसा वसूला जाएगा। हम दूसरे वामदलों, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, समानता दल व एनजीओ को साथ लेकर मोर्चा निकालेंगे। साथ ही भाकपा हर जिले, हर गांव में हस्ताक्षर अभियान चलाएगी।

उनके इस वक्तव्य में जो बात समझ नहीं आ रही वह यही है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, उसके स्तर पर सभी राजनीतिक पार्टियां सरकार के स्तर पर उससे कई मुद्दों पर सहमत और असहमत हो सकती हैं, किंतु जो मुद्दे सभी के हित में हैं उस पर वे और उन जैसी अन्य परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से जुड़ी समाजवादी पार्टयिां एक मत क्यों नहीं होना चाहती ? लोकतंत्र का मतलब यह तो नहीं है कि सरकार की सही मंशा को भी संदेह की दृष्टि से देखा जाए।

वस्तुत: जिस तरह से शहर बढ़ रहे हैं और कृषिकी भूमि जिस तेजी से विस्तार लेते हुए कंक्रीट में तब्दील होती जा रही है, उसके देखते हुए सरकार के पास आखिर अन्य क्या विकल्प आज के समय में स्मार्ट शहर बसाने के अलावा शेष बचे हैं ? क्या आज के समय में कम्युनिष्ट दल इस प्रश्न का कोई जवाब देने की स्थिित में हैं ? क्या वे ओर कोई नया रास्ता सुझाने वाली हैं ? निश्चित ही लोकतंत्र में असहमत होने के लिए पर्याप्त जगह मौजूद है किंतु इसका मतलब यह कतई नहीं हो सकता कि सरकार के प्रत्येक सही निर्णय पर भी संदेह व्यक्त किया जाए। इसका सबसे सफल दिल्ली मेट्रों का उदाहरण हमारे सामने हैं । आज मेट्रो ट्रेन ने दिल्ली में एक नई व्यवस्था और संस्कृति को जन्म दिया है । इसके कारण यहां नागरिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कोई सड़ी गली पुरातन व्यवस्था को बदलने के लिए समय जाया करने से अच्छा है , नई व्यवस्था खड़ी कर देना । समय के साथ लोग स्वत: ही उसका अनुसरण करने लगते हैं ।

केंद्र की सरकार देश में जिन 100 स्मार्ट सिटी बनाने पर काम कर रही है, उसके प्रारंभिक पांच वर्षों में 45 हजार से 50 हजार करोड़ रुपये खर्च करेगी । यह सर्वविदित है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आर्थिक विकास की रफ्तार तेज करने एवं समावेशी शहरी विकास को बढ़ावा देने की मंशा से ही ‘कायाकल्प एवं शहरी रूपांतरण के लिए अटल मिशन’ एवं ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ को मंजूरी दी है। इन दो नये शहरी मिशनों के तहत केन्द्र सरकार की ओर से शहरी विकास पर तकरीबन दो लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च आएगा। प्रश्न आज यह नहीं है कि इस पर सरकार कितना खर्च करेगी या कुल खर्च विकास पर कितना आएगा। प्रश्न यह है कि स्मार्ट सिटि के नाम पर कम्युनिस्ट पार्टियां जिस तरह से देश की आवाम को काल्पनिक भय दिखा रही हैं वह कितना जायज है ?

वस्तुत: आज यह हम सभी को समझना होगा कि जनगणना 2011के अनुसार भारत की वर्तमान जनसंख्या का लगभग 31 फीसदी को शहरों में बसता है और इनका सकल घरेलू उत्पाद में 63 फीसदी का योगदान हैं। जैसा कि वक्त के आगे बढऩे के साथ उम्मीद की जा रही है कि वर्ष 2030 तक शहरी क्षेत्रों में भारत की आबादी 40 प्रतिशत तक हो जाएगी और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 75 प्रतिशत का होगा । इसके लिए भौतिक, संस्थागत, सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे के व्यापक विकास की आवश्यकता है। इसी की पूर्ति के लिए भारत सरकार का ये स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट है, इसके कारण उम्मीद यही है कि सभी के जीवन में गुणवत्ता के साथ विकास तथा प्रगति के एक गुणी चक्र की स्थापना हो सकेगी।

स्मार्ट सिटी मिशन के माध्यम से सरकार शहर के बीच में ही बहुत सघन जनसंख्या को व्यवस्थित रूप से बसा पाने में सफल रहेगी। इसके कारण देश का बहुत सा राष्ट्रीय धन पेट्रोल-डीजल या अन्य ईंधन सीधे तौर पर बचेगा ही साथ में एक स्थान से दूसरे स्थान तक लोगों के आने-जाने में लगने वाले समय में भी भारी कमी आएगी, जिससे वे अपने समय का अधिक उपयोग अपने अन्य उपयोगी कार्यों में भी कर सकेंगे। वहीं, इसका एक प्रभाव यह होगा कि इससे शहर के अन्य वासियों तक सुविधाएं समुचित ढंग से पहुंचने की आशा बलवती होती हैं। इस तरह इसे देखें तो यह स्थानीय विकास को सक्षम करने और प्रौद्योगिकी की मदद से नागरिकों के लिए बेहतर परिणामों के माध्यम से जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने तथा आर्थिक विकास को गति देने के लिए भारत सरकार द्वारा एक अभिनव और श्रेष्ठ कार्य है।

स्मार्ट सिटी मिशन देश के नागरिकों को यह आश्वासन देता है कि वह भारत के आम नागरिकों को मूल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए और एक सभ्य गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान करे। साथ में वह उन्हें एक स्वच्छ और टिकाऊ पर्यावरण एवं ‘स्मार्ट’ समाधानों के प्रयोग का मौका भी दे। यहां सरकार ने क्षेत्र के आधार पर प्रगति के तीन मॉडल रेट्रोफिटिंग, पुनर्विकास, हरितक्षेत्र का विकल्प सभी को दिया है। जिनमें यह बुनियादी सुविधाओं के तत्व समान रूप से रहेंगे, यथा-पर्याप्त पानी की आपूर्ति, निश्चित विद्युत आपूर्ति, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन सहित स्वच्छता, कुशल शहरी गतिशीलता और सार्वजनिक परिवहन, किफायती आवास, विशेष रूप से गरीबों के लिए, सुदृढ़ आईटी कनेक्टिविटी और डिजिटलीकरण, सुशासन, विशेष रूप से ई-गवर्नेंस और नागरिक भागीदारी, टिकाऊ पर्यावरण, नागरिकों की सुरक्षा और संरक्षा, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों की सुरक्षा,स्वास्थ्य और शिक्षा।

आज यह सभी को जानना चाहिए कि भारत में दुनिया के चौदह देशों ने स्मार्ट शहरों को बनाने में अपनी रूचि दिखाई है। इनमें अमरीका, जापान, चीन, सिंगापुर, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैण्ड, स्वीडन, इजरायल, तुर्की और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। अंत: अंत में यही कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (एम) या अन्य समाजवादी पार्टियां जो इस वक्त स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन या इन जैसे अन्य नवाचारों का विरोध कर रही हैं उन्हें अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए । वस्तुत: इस पर गंभीरता से विचार करने पर वे भी यही पाएंगी कि स्मार्ट सिटी का अधिक से अधिक निर्माण, अन्य वैश्विक नवाचार वर्तमान भारत की आवश्यकता है, इसकी गति में अड़ंगें डालना सही पूछिए तो भारत के भावी विकास की गति को धीमा करना ही है, जिससे कि कम से कम कम्युनिष्ट पार्टियों को अवश्य ही बचना चाहिए।

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