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चुनावी दंगल : सपा की शरण में कांग्रेस

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नई दिल्ली। आखिरकार कांग्रेस को सपा की शरणागति मिल ही गई। यह परस्पर विरोधी गठबंधन है। कांग्रेस के हित सपा से मेल नहीं खाते। सपा कांग्रेस की खोई हुई राजनीतिक जमीन पर काबिज है। ये दोनों मिले क्योंकि चुनौती भाजपा की है। जरा सोचिए लगातार दस साल अपने बलबूते पर वापसी का सपना देखने वाले राहुल गांधी को हकीकत समझ में आ ही गई। सवाल यह है कि कांग्रेस ने यही समझौता बसपा से क्यों नहीं किया? सीताराम केसरी ने 1996 के चुनाव में बसपा से हाथ मिलाया था। वह प्रयोग परवान नहीं चढ़ सका। क्या इसलिए नए प्रयोग की जरूरत पड़ी? तब कांग्रेस को 33 सीटें मिली थीं। उसके बाद उसकी सीटें घटती ही गईं।

इस गठबंधन से कुछ बातें तय हो गई हैं। पहली यह कि सपा की कमान संभालने और घरेलू लड़ाई जीत लेने के बावजूद अखिलेश यादव में चुनावी महाभारत जीतने का भरोसा नहीं पैदा हुआ। तभी तो कांग्रेस से चल रही बातचीत टूटती-टूटती आखिर में बन ही गई। इससे किसको कितना फायदा होगा? इसमें किसने क्या भूमिका निभाई? ये सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण अब नहीं रह गए हैं। पर इतनी बात बहुत साफ है कि राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर जो सवाल गैरकांग्रेसियों के मन में थे उस पर कांग्रेस ने भी मुहर लगा दी है। यह समझौता तो प्रियंका गांधी की रणनीतिक कुशलता का परिणाम है। दूसरी बात यह तय हो गई है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन ने अपनी लड़ाई भाजपा से मान ली है। राज्य के चुनाव में इसे राजनीतिक विडंबना नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे।

सत्तारूढ़ दल राज्य के तीसरे पायदान पर खड़े भाजपा से अपना मुकाबला मान रहा है। जाहिर है कि चुनाव की बयार अपने उलट बहने के अंदेशे से अखिलेश यादव डरे हुए हैं। वे जिन सलाहकारों से संचालित हो रहे हैं वे उनका बल बढ़ाने की बजाय कमजोरियों को ही उजागर करने में जुटे दिखते हैं। लड़ाई के मैदान में यह भांप पाना अनुभवहीन लोगों के लिए कठिन होता है। तीसरी बात यह है जो तय हो गई है कि अब त्रिकोणीय टक्कर होगी। भाजपा, बसपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन में मुकाबला तय हो गया है। इसके सामाजिक अर्थ बहुत साफ हैं। सपा और कांग्रेस का मिलन बिंदु है-सेकुलरिज्म। चुनाव में यह दुधारी तलवार बनकर कहां किसे घायल करेगी, अभी इस वक्त कहना करीब-करीब असंभव है। इस बारे में इशारे किए जा सकते हैं। बसपा ने 97 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारकर एक चुनौती उछाल दी है। उसी की प्रतिक्रिया में सपा-कांग्रेस का गठबंधन हुआ है।

साफ है कि मुस्लिम वोटों पर दो तरफा दावेदारी का खेल उत्तर प्रदेश में शुरू हो गया है। यह हो ही नहीं सकता कि बसपा की नेता मायावती उस प्रमाण पत्र को अखिलेश यादव के खिलाफ न दिखाएं और समझाएं जिसे मुलायम सिंह ने दिया है। पिता का दिया हुआ प्रमाण पत्र क्या फर्जी हो सकता है? यह सवाल मायावती पूछेंगी। जिसका जवाब अखिलेश यादव के पास नहीं होगा। वह प्रमाण पत्र पुराना नहीं है। ताजा है। घरेलू झगड़े के दौरान मुलायम सिंह ने एक दिन खुलेआम कहा कि अखिलेश मुस्लिम विरोधी हैं। यही वह प्रमाण पत्र है। एक दूसरा प्रमाण पत्र भी है जिसे आजम खां ने समय-समय पर कांग्रेस पर चस्पा किया है। उसका संबंध कांग्रेस की मुस्लिम विरोधी हरकतों से है। उसे आजम खां तुरुप के पत्ते की तरह चलते रहे हैं। तो अब आजम खां के सामने बड़ा सवाल होगा कि वे जवाब में क्या कह पाएंगे? इस मायने में ही उत्तर प्रदेश का यह चुनाव रोज रोचक होता जा रहा है।

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