Home मध्यप्रदेश आत्मरक्षा के प्रति महिलाओं में जागरूकता का अभाव

आत्मरक्षा के प्रति महिलाओं में जागरूकता का अभाव

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भोपाल/इंदौर। महिलाओं के साथ आए दिन होने वाले अपराधों का ग्राफ भले ही बढ़ रहा हो, किंतु आत्मरक्षा के लिए वे आगे कदम बढ़ाने से कतरा रही हैं। जिले में तीन साल में शस्त्र लाइसेंस में मात्र तीन फीसदी महिलाओं ने ही पुरुषों के मुकाबले लाइसेंस के लिए आवेदन किया। नियमों के कड़े होने से भी महिलाओं को लाइसेंस लेने में परेशानी हो रही है। प्रदेश में महिलाओं के साथ लूटपाट, बलात्कार, एसिड अटैक सहित कई तरह की घटनाएं आए दिन सामने आ रही हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुलिस भले ही दावे करे किंतु आत्मरक्षा के लिए महिलाएं खुद ही आगे नहीं आ रही हैं।

आत्मरक्षा के लिए महिलाओं ने शस्त्र कला सीखने के साथ ही सुरक्षा के लिए उपायों पर भी ध्यान देना ही उचित नहीं समझा। अपनी रक्षा के लिए हमेशा की तरह ही वे बेचारी व अबला बनकर ही रहना अपना जीवन मान रही हैं। अबला से सबला बनकर अपनी शक्ति दिखाने में पिछडऩे वाली महिलाओं में से जिले की 17 महिलाओं ने आत्मरक्षा के लिए शस्त्र लाइसेंस लिए हैं। जिला प्रशासन के लाइसेंस शाखा से मिली जानकारी के अनुसार पिछले तीन सालों में इन महिलाओं ने ही आवेदन किए। जिले की प्रथम नागरिक, सांसद,जिला पंचायत अध्यक्ष व विधायक के पास भी शस्त्र लाइसेंस नहीं होना गंभीर बात है। वर्ष 2014 में 13 महिलाओं ने आवेदन किया, वहीं 2015 में 4 ने गत वर्ष सात महिलाओं ने लाइसेंस की मांग की, जबकि इन वर्षों में 400 से अधिक पुरुषों ने लाइसेंस के लिए आवेदन किए हैं।

महिलाओं को लाइसेंस में पिछड़ने में शासन की नीति व प्रशासन की अनदेखी भी एक कारण हो सकती है। लाइसेंस बनवाने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया में सबसे पहले आवेदक को आवेदन करने के बाद पुलिस से जान को खतरा साबित कराकर लाना जरूरी है। अधिकांश मामलो में पुलिस की रिपोर्ट आवेदक के पक्ष में ही होती। महिला आवेदकों के मामले में खतरा साबित करना कठिन मामला माना जाता है। इसके चलते पुलिस महकमा उनकी अनुशंसा करने से कतराता है। दूसरी कड़ी में एसडियों से मांगी जाने वाली रिपोर्ट में तहसीलदार व राजस्व निरीक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। निर्धारित समय पर पुलिस से रिपोर्ट कलेक्टर कार्यालय तक पहुंच जाती है, किंतु एक ही भवन में रिपोर्ट तैयार कर देने में सालों का समय बीत जाता है। आवेदक जब स्वयं जाकर एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय में दौड़ लगाता है तो रिपोर्ट तैयार होती है, जिसमें भी तीन से चार माह का समय लग ही जाता है। जबकि इन मामलों में सत्यापन के लिए 6 कार्य दिवस की सीमा तय की गई है।

वर्तमान में किए गए बदलाव के अनुसार मानसिक रोगी न होने, शराब के आदी न होने के साथ ही शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण होना भी जरूरी है। इस नियम के चलते अधिकांश आवेदक किनारा कर रहे हैं। जिले में पिछले चार सालों से आवेदन लंबित बताए जाते हैं, जिन पर आज तक एसडियों की कार्यालय में रिपोर्ट नहीं आई है और एडीएम व कलेक्टर की सुनवाई बाकी है। जिले में अधिकारियों द्वारा अपने स्तर पर बनाए गए नियमों के चलते आवेदक भटक रहे हैं और राशि खर्च होने के बावजूद उनके लाइसेंस जारी नहीं हो रहे हैं। एडीएम सुनवाई कर लोगों को कलेक्टर के पास भेजते हैं, जहां सिफारिश न होने पर कलेक्टर सैलूट करने में अक्षम। खेती करने वाले अन्य छोटे कारण बतारकर आवेदन को निरस्त करते आ रहे हैं। नियमानुसार एडीएम की अनुशंसा के आधार पर कलेक्टर लाइसेंस जारी करने के आदेश जारी करते रहे हैं। पिस्टल व रिवाल्वर के मामलों में गृह मंत्रालय व मंत्री की अनुशंसा जरूरी है। भोपाल से अनुशंसा मिलते ही लाइसेंस जारी किए जाते हैं। लाइसेंस के नाम पर जिले मे रेडक्रास के लिए मोटी रकम वसूली जा रही है। जिले में लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए लाइसेंस लेने के आवेदन करते हैं, पर अधिकारी उनसे 10 हजार रुपए तक रेडक्रास राशि वसूल रहे हैं। राशि जमा नहीं करने वालों के आवेदन आगे बढ़ ही नहीं पाते हैं। अनुशंसा होने के बाद भी लाइसेंस जारी नहीं किए जा रहे हैं।

एक अधिकारी का मामले में कहना है कि बंदूक लाइसेंस जारी करने से पहले सत्यापन की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए वर्तमान में भी 400 आवेदन लंबे समय से लंबित है। इन आवेदनों में केवल कुछ ही महिलाओं के आवेदन हैं। महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के लिए शासन ने तुरंत पुलिस से कार्रवाई करने को कहा है किंतु उन्हें सबल करने पर किसी ने ध्यान देना भी उचित नहीं समझा। पुलिस और प्रशासन को महिलाओं को सुरक्षित महसूस करने के लिए कानून और व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा के मामलों को कम करने के लिए सतत कदम उठाए जा रहे हैं, किंतु कोई भी उन्हें आत्मरक्षा के लिए प्रेरित करने को तैयार नहीं है। यदि अपराधों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि गत 3 सालों में 490 मामले महिलाओं के साथ बलात्कार के सामने आए हैं, वहीं 34 मामले सामूहिक बलात्कार के रहे हैं। इसी तरह हत्या के 57 मामले दर्ज किए गए हैं।

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