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यूपी के पास जाति-धर्म की सियासत से बाहर निकलने का मौका

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की ओर पूरे देश की निगाह लगी है। दिल्ली की सियासत का रुख तय करने वाला यूपी इस चुनाव में अपनी तक्दीर लिखेगा। सूबे में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा), प्रमुख विपक्षी दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस सहित राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), अपना दल समेत कई छोटे दल इस चुनाव में अपना भाग्य आजमाएंगे। विधानसभा चुनाव का यह महासमर इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर वोट मांगने को अनुचित करार दिया है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि जातिगत समीकरणों के आधार टिकट बांटने वाले सियासी दल क्या वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लाज रखेंगे। जनता को विकास के मुद्दे पर अपना जनप्रतिनिधि चुनने की आज़ादी होगी या फिर यह सारी कवायद महज एक आदेश बनकर रह जाएगी। देखा जाए तो देश के हर राज्य में जाति और धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है।

यूपी भी इससे अछूता नहीं है। मण्डल-कमण्डल की राजनीति को प्रदेश ने बहुत गहराई से महसूस किया है। बाद में यह राजनीति अलग-अलग जाति और धर्म के गुटों में तब्दल हो गई। दलित, ओबीसी, सवर्ण, मुसलमान आदि इसी का हिस्सा रहे। हालांकि बीते लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने सबका साथ-सबका विकास जैसे नारों से इससे ऊपर उठने की कोशिश की और काफी हद तक वह कामयाब भी रहे, लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव एक बार फिर जातीय समीकरणों में उलझते नजर आ रहे हैं। जातिवादी सियासत पर नजर डालें तो बसपा के संस्थापक कांशीराम ने ऊंची जातियों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों से मुक्ति के लिए दलित समुदाय को संगठित किया। उनकी राजनीति में पहचान स्थापित की और इस बात का एहसास भी कराया कि उनके वर्ग का कोई व्यक्ति यूपी जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन सकता है।

बसपा ने जातिवाद को इतना बड़ा हथियार बनाया कि बाद में मायावती ने तिलक, तराजू व तलवार के आपत्तिजनक नारे से भी परहेज नहीं किया। हालांकि अब वह सोशल इंजीनियरिंग की राह पर आकर सभी जातियों को साधने में लगी हुई है। समाजवादी पार्टी की बात करें तो वह पारम्परिक जनाधार यादव-मुस्लिम का समर्थन बनाए रखने की कोशिश में जुटी रहती है। इस बार पार्टी के आन्तरिक विवाद के बीच अखिलेश यादव समाज के अन्य वर्गों का भी समर्थन पाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस की सियासत की बुनियाद ही जाति पर आधारित रही है। हालांकि धीरे-धीरे उससे जातियों का मोहभंग होता रहा। दरअसल देखा जाए तो अभी भी जातिगत समीकरण के आधार पर चुनाव जीतने की पुरानी सोच में नेता उलझे हुए हैं। मायावती ने बसपा के नारे भले ही बदल दिए, लेकिन उनकी बुनियादी सोच नहीं बदली है। वह यह मानकर चलती हैं कि दलित वोटबैंक पर उनका एकाधिकार है और अगर उन्हें एकमुश्त मुस्लिम वोट मिल जाए तो चुनावी नैया पार हो जाएगी।

मायावती मुस्लिम समुदाय से सपा में आन्तरिक घमासान के आधार पर एकमुश्त वोट चाहती हैं, जिससे वह भाजपा को सत्ता में आने से रोक सके। हालांकि कुछ राजनैतिक विश्लेषकों के मुताबिक वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर के बाद भाजपा की जीत से यह मिथक खत्म हो जाना चाहिए कि मुस्लिम समुदाय किसी एक पार्टी के पक्ष में या विरोध में एकजुट होकर वोट देता है। असम विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत भी इसका प्रमाण है। भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी इस बात का सन्देश देने में कामयाब भी हुई कि वह अलग-अलग विचारधारा के लोगों को साथ में लेकर चलने में सक्षम है। वहीं पूर्ण बहुमत मिलने के बाद भी अभी तक नरेन्द्र मोदी सरकार पर केवल हिन्दुत्व की राजनीति या किसी वर्ग को साधकर चलने का आरोप नहीं लगा है। वह यूपी विधानसभा चुनाव में लोगों से जाति, धर्म से ऊपर उठकर वोट देने की अपील कर चुके हैं। इसलिए वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव की तुलना में प्रदेश की सियासत में जाति और धर्म का असर कुछ कम तो हुआ है, लेकिन इससे पूरी तरह निजात नहीं मिल पाई है। ऐसे में सियासी दल न सही लेकिन अगर जनता विकास को ही वोट का आधार बना ले और अपने अधिकार के लिए जनप्रतिनिधयों से सीधे सवाल-जवाब करे तो शायद प्रदेश की राजनीति धर्म-जाति के कुएं से बाहर निकलकर विकास का उजाला देख सकेगी।

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