Home मध्यप्रदेश बेखौफ होकर हरियाली नष्ट कर रहे राजस्थानी मवेशियों के झुंड

बेखौफ होकर हरियाली नष्ट कर रहे राजस्थानी मवेशियों के झुंड

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शाजापुर। मालवा के बारे में एक पुरानी ओर प्रचलित कहावत आदिकाल से चली आ रही कि मालव भूमि गहन गंभीर, पग पग रोटी डग डग नीर। किन्तु लगता है कि अब ये कहावत धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर है, क्योंकि मालवा भूमि से नीर अर्थात पानी लगातार गायब होता जा रहा है और उसके पीछे सबसे बड़ा कारण क्षेत्र से हरियाली और पेड़-पौधौं का समाप्त होना है। इस पर्यावरण विनष्टीकरण के पीछे बहुत हद तक राजस्थान के भेड़ पालक चरवाहों का हाथ है जो कि मालवा जैसे हरे-भरे क्षेत्र को शनै:-शनै: रेगिस्तान में तब्दीली की ओर धकेल रहे हैं।

गौरतलब है कि इन दिनों शहरी क्षैत्र में राजस्थानी मवेशी यानि की भेड़ और ऊंट की बहुतायत मात्रा में आमद हो रही है लेकिन इन मवेशियों आना जितना खुबसूरत लगता है ये उतना ही अधिक स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का सबब भी बनते हैं। हकीकत में झुंड के रूप में प्रवेश करने वाले इन मवेशियों के कारण मालवा की हरियाली पर संकट उत्पन्न हो रहा है और जंगलों की चरवाही भूमि खत्म होने के कारण स्थानीय स्तर का पशुपालन तक प्रभावित होने लगा है। यह सबकुछ इतने धीरे-धीरे ओर दयनियता की चादर ओढक़र किया जा रहा है कि मालवा का भोला-भाला किसान इसको शुरू में समझ ही नहीं पा रहा है।

स्थानीय कृषकों की सोच रहती है कि बेचारे गरीब भेड़पालक भेड़ों को पालकर अपना पेट भर रहे हैं इन्हें चरने दो, किन्तु जब किसानों के पास खुद के पशु के लिए जंगल में चारा ही नहीं बचता तब उन्हें बात समझ में आती है। क्योंकि स्थानीय पशु गाय, भेंस, बकरी आदि चारे को कुतरकर खाते है। जिससे उनकी जडें बची रहती है ओर वर्षाकाल में फि र से नया चारा उग आता है। जबकि भेड़ जिस पौधे पर भी मुंह मारती है उसे जड़ से ही खत्म कर देती है। इसके साथ ही बड़े-बड़े लम्बे बांस लिए हुए चरवाहें आस-पास के सभी पेड़ों की पत्तियां गिराकर पेड़ों को नंगा कर देते है।

पशुपालन हुआ महंगा-

स्थानीय पशुओं को पहले सुबह किसान घर से जंगल में चराने ले जाता था तो रास्ते में एवं सार्वजनिक गोचर भूमि पहाड़ी आदि पर उस पशु को कुछ पेट भरने को मिल जाता था। किन्तु अब हालात यह है कि जंगल में हजारों की संख्या वाले भेड़ो के झुण्ड कुछ बचने ही नहीं देते तो जंगल ले जाकर सिर्फ  पशु को थकाना ही है। लिहाजा स्थानीय पशुपालक ओर किसान मजबूरी के चलते पशु को घर पर ही बांधकर खिला रहे हैं। इस कारण पशुपालन एक महंगा सौदा बन गया है। कई लोगों ने तो पशु रखना ही बंद कर दिए ओर जो रख रहे हैं वो खासे परेशान हैं।

स्थानीय पशुओं में संक्रमण और दुध को महंगा करती है भेंड़े-

इन भेड़ों के मालवा भ्रमण का सीधा-सीधा असर आमआदमी की जेब पर भी पड़ा है। घर पर बंधे हुए पशु को खिलाने की लागत का असर सीधा दुध की कीमतों पर पड़ रहा है ओर दूध की कीमतें दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है क्योंकि चारा भी महंगा होता जा रहा है। वहीं भेड़ों के भ्रमण के बाद क्षेत्र की मुसीबतें ओर भी बढ़ जाती है। क्योंकि भेड़ चारा तो खत्म करती ही है साथ ही स्थानीय पशुओं को घातक संक्रामक बीमारियां बोनस में दे जाती है। भेड़ों के मुंह ओर उसके गोबर में कुछ घातक बेक्टीरियां मौजूद होते हैं जिनके संपर्क में आने से स्थानीय पशुओं को वखूर पका या मुंह पका रोग जिसे स्थानीय भाषा में खरावड़ा कहते हैं, हो जाता है। इस रोग के कारण एक ओर तो पशु के पांव में संक्रमण होकर जख्म हो जाते हैं वहीं मुंह में भी पकाव लग जाता है। जिसके कारण पशु न तो चल सकता है ओर न ही कुछ खा सकता है। इस रोग ही भयावहता यह भी है कि यदि यह रोग एक पशु को हो गया तो उस पशु मालिक के पूरे रेवड़ में यह फैल जाता है। जिसके बाद पूरे गांव में यह बिमारी फैलने का खतरा हो जाता है।

आक्रामक हंै भेड़ पालक-

मालवा के किसानों ने इन भेड़ पालकों को रोकने की कई बार कोशिशें की है, किन्तु हर जगह ये चरवाहें मरने-मारने को उतारू हो जाते है ओर अपनी पगड़ी में बंधी गोफन से गोलियों की तरह पत्थर बरसाते हैं। इसके चलते कई जगह खूनी संघर्ष भी हुए हैं। ये चरवाहें इतने आक्रामक होते हैं कि मात्र दो-चार चरवाहों ने कई बार पूरे गांव के किसानों तक को खदेड़ दिया है। वास्तव में बड़े दयनीय से दिखने वाले ये चरवाहें एक सुनियोजित भेड़ माफि या के पूर्जे हैं। इनके आका ठेठ राजस्थान में बैठकर बड़े-बड़े व्यापार ओर राजनीति कर रहे हैं। कई बार किसी विवाद के कारण वे लोग जब मालवा की तरफ आते हैं तो उनके ठाठ-बांट ओर गाडिय़ां अपनी कहानियां खुद बयां कर देती हैं। भेड़ पालन अपने आप में एक बहुत बड़ी इंडस्ट्री है जिसके तार राजस्थान के रेगिस्तान से लगाकर हैदराबाद की चार मिनार तक फैले हुए हैं।

सोना उगलता है यह धंधा-

इस इंडस्ट्ी में केवल प्राथमिक निवेश भेड़ो के झुण्ड बनाने में करना है फिर मात्र एक वर्ष में यह इंडस्ट्री ऑटो मोड में आकर सोना उगलने लगती है। एक भेड़ साल भर में दो बच्चे देती है। इस प्रकार एक झुण्ड में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में भेड़ों का जन्म होता है जिनसे ऊन तो प्राप्त होता ही है साथ ही अच्छी कीमत पर भेड़े बिकती भी हैं। लेकिन इन्हें खिलाने के नाम पर भेड़ पालक का एक पैसा भी खर्च नहीं होता सिर्फ  चरवाहों की तनख्वाह ही देना होती है। भेडों के खरीददार ओर दलाल खुद इनके डेरों तक पहुंचते हैं ओर गाड़ी भरकर खुद उसे हैदराबाद की मंडियों तक पहुचाते हैं। ऐसी सोना उगलने वाली इंडस्ट्री से मालवा को रेगिस्तान बनने का खतरा ओर भेड़ों से होने वाली बिमारियां बदले में मिल रही है।

राजस्थान में तगड़ा विरोध है इन भेंडों का-

इन भेड़ पालकों का खुद राजस्थान में बहुत प्रबल विरोध होता है ओर वहां का किसान आक्रामकता के साथ एक होकर इन भेड़ों को अपने गांव में प्रवेश नहीं करने देते। किन्तु ये मालवा के किसानों की नेकदिली है कि ठेठ जालोर, जैसलमेर, पाली, बाड़मेर, नागौर ओर सांडेरा जैसे दूर-दराज के इलाकों से ये लोग यहां आते है ओर यहां का किसान इनका प्रतिरोध भी नहीं करता ओर बदले में उसे चारे का अभाव ओर पशुओं में फैलने वाली घातक बिमारी मिलती है। इस समस्या को शासन स्तर पर गंभीरता से लिया जाना चाहिए अन्यथा दुध के दर्शन तो दुर्लभ होगें ही मालवा में भी किसी दिन बालू उडऩे लगेगी…।

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