Home राजधानी अभी नहीं संभले तो दिल्ली जैसे हो जाएंगे हालात

अभी नहीं संभले तो दिल्ली जैसे हो जाएंगे हालात

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भोपाल । देश की राजधानी नई दिल्ली इन दिनों भयानक प्रदूषण की चपेट में हैं। दिल्ली में प्रदूषण का लेवल इतना ज्यादा है कि स्कूलों की छुट्टी तक घोषित करना पड़ी है। दिल्ली का प्रदूषण घातक स्टेज पर पहुंच गया है। दिल्ली की तरह ही मध्यप्रदेश के कई शहरों के हालात बनते जा रहे हैं। यहां भी राजधानी भोपाल, इंदौर, ग्वालियर जैसे महानगरों के साथ ही कुछ छोटे शहरों में प्रदूषण तीसरे लेवल यानी एक्यूट लेवल पर पहुंच गया है। यानी लीथल स्टेज पर पहुंचने के लिए अभी एक स्टेज पर पहुंचना रह गया है। इसलिए यदि नहीं संभले तो यहां भी लीथल स्टेज पर पहुंच सकता है। यह बात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पिछले साल कराए गए एक सर्वे में सामने आया था।

प्रदूषण मामलों के जानकारों का कहना है, कि शहर में प्रदूषण पुराने वाहन, लेडयुक्त डीजल पेट्रोल का उपयोग व वाहनों के डीजल के साथ केरोसिन की मिलावट की वजह से बढ़ रहा है। प्रदूषण को कम करने के लिए हमें व प्रशासन को संयुक्त रूप से प्रयास करने होंगे। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यहां भी हालात दिल्ली सरीखे हो सकते हैं।

जानकारों द्वारा प्रदूषण के पांच लेवल बताए गए हैं, जिनमें फस्र्ट लेवल यानी नार्मल पॉल्यूशन, जो कि सामान्य लेवल होता है। इस लेवल से वातावरण में अधिक बदलाव नहीं होता। इससे स्वास्थ्य पर भी बुरा असर नहीं पड़ता।

सेकंड लेवल यानी हेवी पॉल्यूशन: यह लेवल नार्मल से अधिक है, लेकिन हानिकारक गैसों की मात्रा मानक स्टेज पर रहती हैं। इससे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। लोग विभिन्न बीमारियों से पीडि़त होने लगते हैं।

थर्ड लेवल यानी एक्यूट पॉल्यूशन: तीव्रगामी प्रदूषण यह हैवी पॉल्यूसन से ऊपर का लेवल होता है। यानी हानिकारक गैसें सामान्य से दो से तीन गुना अधिक वातावरण में रहती हैं। इससे ब्रोमकाइटिस व अस्थमा जैसे रोग लोगों को होते हैं।

फोर्थ लेवल यानी क्रोनिक पॉल्यूशन: एक्यूट लेवल के प्रदूषण से यह लेवल ऊपर का होता है। इसमें हानिकारक गैसों की मात्रा वातावरण में काफी होता है।

फिफ्थ लेवल यानी लीथल पॉल्यूशन: लीथल पॉल्यूशन सबसे अंतिम स्टेज का प्रदूषण है। यानी इसमें हानिकारक गैसों का लेवल इतना अधिक होता है कि लोग मरणासन्न तक हो जाते हैं या मर भी सकते हैं।

प्रदेश के शहरों में डीजल वाहन अधिक हैं। खासतौर से टेंपो व ऑटो। चूंकि शहर में पुराने यानी 10 साल से अधिक पुराने वाहन चल रहे हैं। ये वाहन धुआं अधिक छोड़ रहे हैं। इससे कार्बन मोनो आक्साइड व कार्बन डाई आक्साइड गैस अधिक निकल रही है। टेंपो व ऑटो में डीजल के साथ केरोसिन मिलाकर वाहन चलाए जा रहे हैं। ऐसे में मिलावट वाला डीजल इंजन में जल नहीं पाता, जिससे कार्बन मोनो ऑक्साइड अधिक मात्रा में निकलती है। पेट्रोल पंप पर भी डीजल व पेट्रोल लेड युक्त मिल रहा है। लेड युक्त डीजल व पेट्रोल का इंजन में पूरी तरह से दहन नहीं हो पाता। इस वजह से कार्बन मोनो आक्साइड व कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन अधिक होता है।

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