भू-अधिग्रहण कानून को लेकर संघ के संगठन ही हुए भाजपा सरकार के खिलाफ
By dsp On 22 Jun, 2015 At 06:52 PM | Categorized As भारत, व्यापार | With 0 Comments
भू-अधिग्रहण कानून को लेकर संघ के संगठन ही हुए भाजपा सरकार के खिलाफ
नई दिल्‍ली। भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के मुद्दे पर केंद्र की भाजपा सरकार का साथ उसके सहयोगी संगठन भी देने के लिए तैयार नहीं हैं। भूमि अधिग्रहण में किसानों की सहमति के प्रावधान को समाप्त करने सहित अध्यादेश के जरिये 2013 के कानून में किये गये कई संशोधनों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ और अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों ने सोमवार को इस पर गठित संसद की संयुक्त समिति के सामने जिस तरह से अपना पक्ष रखा, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाली खबर है।
कंसेट क्‍लाउज व सोशल इम्‍पैक्‍ट सर्वे को शामिल करने पर अड़े संगठन
सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को इन संगठनों ने समिति के सामने जो राय रखी, वह सरकार द्वारा अध्यादेश के जरिये कानून में किये गये संशोधनों से इत्तेफाक नहीं रखती है। सूत्रों ने बताया कि भाजपा और आरएसएस से जुड़े ये संगठन अति विवादास्‍पद कंसेंट क्‍लाउज को हटाने समेत कई प्रावधानों पर अड़ गए हैं, जो यूपीए सरकार द्वारा तैयार लैंड बिल के हिस्‍से थे। इन संगठनों ने 2013 में यूपीए सरकार तैयार लैंड बिल से हटाए गए सोशल इम्‍पैक्‍ट सर्वे से जुड़ी शर्तों को वापस जोड़ने की भी मांग की।
50 से अधिक संगठनों ने किया इन मांगों का समर्थन
सोमवार को समिति के सामने उक्त संगठनों के अलावा कई दूसरे किसान संगठनों ने भी अपनी राय रखी। इनमें शामिल राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने अपनी राय रखते हुए किसानों की सहमति को बरकरार रखने, सिंचित भूमि का अधिग्रहण नहीं करने और अधिग्रहित भूमि का पांच साल उपयोग नहीं होने की स्थिति में उसे किसानों को वापस करने के प्रावधान बरकरार रखने की बात कही। आज जो प्रस्‍ताव संसद की संयुक्‍त समिति के समक्ष भेजे गए, उन पर उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखंड, बिहार, एमपी, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, दिल्‍ली समेत अन्‍य राज्‍यों के 50 से अधिक किसान संगठनों की सहमति थी।
किसान सिंचित भूमि नहीं, बंजर भूमि के अधिग्रहण के पक्ष में
किसान संगठन चाहते हैं कि सरकार सिंचित भूमि का अधिग्रहण नहीं करके बंजर भूमि का अधिग्रहण करे। किसानों से उनकी मर्जी के खिलाफ जमीन अधिग्रहण की स्थिति में कुल मुआवजे का 75 फीसदी अतिरिक्‍त मुआवजा देने की शर्त पर सरकार द्वारा चर्चा नहीं करने से भी किसान खफा हैं।
बता दूं कि 1894 के एक्‍ट की धारा 5ए के तहत अधिग्रहण के खिलाफ किसानों को आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार दिया गया था, जो अभी तक चला आ रहा है। लेकिन एनडीए सरकार ने इस क्‍लाउज को ऑर्डिनैंस से इसे हटाने का विवादास्‍पद कदम उठाया।
बीकेएस ने कहा, सरकार ने की किसानों के हितों की अनदेखी
बीकेएस ने साफ कहा कि सोशल इम्‍पैक्‍ट एसेसमेंट के प्रावधानों को बिल से हटाकर सरकार ने किसानों के हितों की पूरी तरह से अनदेखी की है। पैनल के समक्ष भेजे अपने पत्र में बीकेएस के जनरल सेक्रेटरी प्रभाकर केलकर ने कहा कि जमीन अधिग्रहण से पहले कम से कम 51 फीसदी किसानों की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए, वरना हम इस बिल को अपनी सहमति नहीं दे सकते। सरकार द्वारा लाए गए ऑर्डिनेंस में किसानों की आपत्तियों के लिए कोई जगह नहीं रह गई है।
प्रगति की राह में हम रोड़े नहीं: वी एम सिंह
किसानों की मांग और सरकार द्वारा उनकी अनदेखी पर कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए राष्‍ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वी एम सिंह ने कहा कि किसान संगठन सरकार द्वारा की जा रही है प्रगति की पहल में रोड़े नहीं बनना चाहते हैं, बशर्ते उनकी मांगों और शर्तों पर गंभीरतापूर्व विचार किया जाए।
सरकारी दावों के विपरीत है भाजपा संगठनों का यह विरोध
आज का यह डेवलपमेंट इसलिए अधिक महत्‍वपूर्ण हो गया है, क्‍योंकि वित्‍त मंत्री समेत सरकार और भाजपा के आला नुमाइंदे अभी तक सार्वजनिक मंचों से कहते आ रहे थे कि अधिकांश मसलों पर उनके सहयोगी किसान-मजदूर संगठन सहमत हैं।
जन जागरण अभियान चलाएगा स्‍वराज अभियान
जेपीसी की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए आप के पूर्व नेता और स्‍वराज अभियान के अगुआ योगेंद यादव ने हालांकि बैठक में चर्चा होने वाले मुद्दों का खुलासा नहीं किया, लेकिन उन्‍होंने धमकी भरे अंदाज में कहा कि उनका संगठन जन जागरण अभियान चलाएगा और इस वर्ष अगस्‍त से एक लाख गांवों को जोड़ने की कोशिश करते हुए संसद तक किसान मार्च का आयोजन करेगा।

 

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