ABCD-2 समीक्षाः यह फिल्म डांस के अलावा कुछ पेश नहीं करती
By dsp On 19 Jun, 2015 At 05:01 PM | Categorized As मनोरंजन | With 0 Comments

varun-dhawan-552e1f5eee8ad_exlstSource: अमर उजला

जीतने से ज्यादा अहम है किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेना। यह हमारी फिलॉसफी यानी दर्शन है। हम ट्रॉफियां और मैडल नहीं जीतते। दिल जीतते हैं। हम हिंदुस्तानी हैं। निर्देशक रेमो फर्नांडिस की एनी बडी कैन डांस यानी एबीसीडी-2 की कहानी इसी दायरे में सिमटी है।

150 मिनट की पूरी तरह से हिप-हॉप को समर्पित यह फिल्म डांस के अलावा कुछ पेश नहीं करती। जबकि सिनेमा के मूल में सबसे पहले रोचक कहानी की अनिवार्यता है। यहां कहानी इतनी है कि टीवी के डांस शो में मुंबई का एक ग्रुप ‘चीटर’ ठहराया जाता है क्योंकि वह कुछ मौलिक के बजाय सिंगापुर के प्रसिद्ध डांस ट्रूप की नकल पेश करता है।

जगह-जगह अपमानित हुआ ग्रुप बिखर जाता है, मगर इसका लीडर (वरुण) हार नहीं मानता। वह लास वेगस में विश्व स्तर की हिप-हॉप प्रतियोगिता के लिए सबको इकट्ठा करता है। इस बार उसे गुरु/कोरियोग्राफर (प्रभु देवा) भी मिल जाता है। बड़ी तैयारियों के बाद सब वेगस जाते हैं और पहली बार हिस्सा लेते हुए फाइनल तक पहुंचते हैं।

जहां मंच पर एक हादसे की वजह से इन्हें जीत की जगह हार मिलती है। हारने के बावजूद ये सब दर्शकों का दिल जीत लेते हैं। …और हमारे यहां हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं!!

रेमो की यह सिनेमाई बाजीगरी बेहद सुस्त, उबाऊ और सपाट है। इसमें भावनात्मक उतार-चढ़ाव पैदा करने की कोशिशें सतही हैं। फिल्म में वरुण-श्रद्धा की जोड़ी है, मगर रोमांस नहीं। यहां कॉमेडी या हल्के-फुल्के क्षण भी नहीं हैं।

varun-dhawan-71-5-556d5a374c666_exlstयहां डांस भी ज्यादा देर तक बांधे नहीं रख पाता क्योंकि आप महसूस करने लगते हैं कि यू-ट्यूब पर एक के बाद दूसरा वीडियो देख रहे हैं। कोरियोग्राफी पर जरूर मेहनत हुई है मगर मंजे हुए डांसर और ऐक्टर का फर्क आपको लॉरेन गॉटलिब और श्रद्धा कपूर में साफ दिखाई देता है।

कुछ ही महीनों पहले हैप्पी न्यू ईयर में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक डांस प्रतियोगिता सबने देखी थी और उसके साथ हीरों की चोरी, लव स्टोरी, पिता-पुत्र संबंध भी देखे थे। एबीसीडी-2 में भी पति-पत्नी का एक बिखरा हुआ रिश्ता और मां-बेटे का इमोशनल कनेक्ट है। कहानी पर मेहनत होती तो शायद यह फिल्म रोचक होती।

आप समझ नहीं पाते कि प्रतियोगिता के दौरान जब श्रद्धा के पैर में फ्रेक्चर होने पर उन्हें डॉक्टरों को दिखाया जा सकता है तो टीम के उस सदस्य को क्यों नहीं, जिसके मुंह से खून आने लगता है। क्यों वह अपनी हालत सबसे छुपाता है, मालूम नहीं पड़ता। यही डांसर हार का कारण भी बनता है।

वरुण-श्रद्धा ऐक्टर के रूप में निराश करते है। लॉरने गाबलिट जरूर अपनी पिछली फिल्म वेलकम टू कराची के मुकाबले प्रभावित करती हैं। प्रभु देवा की प्रतिभा यहां एक डांस में सिमटी है। निर्देशक ने कहानी कहने से ज्यादा कोरियोग्राफी का कौशल दिखाया है। सिने-प्रेमियों से ज्यादा यह फिल्म उन्हें पसंद आएगी जो डांस के दीवाने हैं और घंटों हिप-हॉप देख सकते हैं। वर्ना कुछ ही मिनटों में अमिताभ बच्चन का यह गाना आपको याद आने लगेगा… मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है।

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